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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

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पृष्ठ 1347

‘उस समय वह इस प्रकार कहेगी—‘मेरे पति भगवान् श्रीराम तथा देवर लक्ष्मण यदि जीवित हों अथवा देवभावको प्राप्त हो गये हों, यह अन्न उनके लिये समर्पित है’॥ १० ॥

‘सम्पाते! रघुनाथजीके भेजे हुए उनके दूत वानर यहाँ सीताका पता लगाते हुए आयेंगे। उन्हें तुम श्रीरामकी महारानी सीताका पता बताना॥ ११ ॥

‘यहाँसे किसी तरह कभी दूसरी जगह न जाना। ऐसी दशामें तुम जाओगे भी कहाँ। देश और कालकी प्रतीक्षा करो। तुम्हें फिर नये पंख प्राप्त हो जायँगे॥ १२ ॥

‘यद्यपि मैं आज ही तुम्हें पंखयुक्त कर सकता हूँ; फिर भी इसलिये ऐसा नहीं करता कि यहाँ रहनेपर तुम संसारके लिये हितकर कार्य कर सकोगे॥ १३ ॥

‘तुम भी उन दोनों राजकुमारोंके कार्यमें सहायता करना। वह कार्य केवल उन्हींका नहीं, समस्त ब्राह्मणों, गुरुजनों, मुनियों और देवराज इन्द्रका भी है॥ १४ ॥

‘यद्यपि मैं भी उन दोनों भाइयोंका दर्शन करना चाहता हूँ; परंतु अधिक कालतक इन प्राणोंको धारण करनेकी इच्छा नहीं है। अतः वह समय आनेसे पहले ही मैं प्राणोंको त्याग दूँगा’ ऐसा उन तत्त्वदर्शी महर्षिने मुझे कहा था’॥ १५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें बासठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६२ ॥