शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation
by महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज
Source: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (origin)
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Read in context७० : शिवसूत्र विमर्श
अर्थ—जैसे मदिरा पीकर उन्मत्त पुरुष यह नहीं देखता कि मेरे द्वारा पहना वस्त्र
शरीर पर है या गिर गया वैसे ही सिद्ध पुरुष जिस शरोर से उसने अपने स्वरूप का
साक्षात्कार किया है वह प्रारब्ध-वश खड़ा है, बैठा है या दैववश कहीं गया है या आया
है—नश्वर शरीर सम्बन्धी इन बातों पर दृष्टि नहीं डालता।
अतः स्वरूप लाभ बनकर योगी का प्राणों से जो सम्बन्ध रहता है वह नैसर्गिक
अर्थात् संवित्-स्वभाव वाला ही होता है ॥४३॥
सम्बन्ध—प्राणन-रूप ग्राहक भूमिका में स्थित यह स्वरूपविमर्श वाला योगी
अलौकिक होता है—अब यह कहते हैं।
नासिकान्तर्मध्यसंयमात् किमत्र सव्यापसव्य सौषुम्नेषु ॥४४॥
नासिका—कुटिल रूप से वहन करने वाली प्राणशक्ति (की)
अन्तः—आन्तरी संवित् (के)
मध्य—(अन्तरतम) मध्यधाम में
संयमात्—विमर्श (बार-बार अनुसन्धान) करने की अपेक्षा
किमत्र—और अधिक क्या है (जो)
सव्य—इड़ा नाड़ी
अपसव्य—पिंगला नाड़ी
सौषुम्नेषु—(और) सुषुम्ना नाड़ी में (अभ्यास करने से प्राप्त हो सकता
है।)
व्याख्या—नेत्र आदि के रोमरन्ध्रों के अन्त तक सब नाड़ीचक्र¹ में प्रधान इड़ा,
पिंगला और सुषुम्ना में जो कुटिलवाहिनी प्राणशक्ति है उसकी आन्तरी संवित् के अन्त-
र्गत मध्यधाम में बार-बार अनुसन्धान करने से परमयोगी स्वात्म-संविन्मय बन जाता
है। ऐसे महायोगी के विषय में 'श्रीकालिकाक्रम' में कहा है :
तस्य देवादिदेवस्य परबोधस्वरूपिणः ।
विमर्शः परमाशक्तिः सर्वज्ञानशालिनी ॥
अर्थ—परबोधमय उस देवों के देव की विमर्शमयता, सर्वज्ञता के ज्ञान से
शोभायमान परमशक्ति है।
ऐसी विमर्शमय दशा में इड़ा (प्राण), पिंगला (अपान) और सुषुम्ना (मध्यनाड़ी)
में अभ्यास करने से ऐसे योगी को क्या लाभ हो सकता है। उसे आन्तर और बाह्य
अभ्यास फिर नहीं करने पड़ते। वह अन्तर्मुख और बहिर्मुख भावों की सब दशाओं में
१. नाडीचक्र में नाडियों की संख्या ७२००० बताई गई है।