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शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

by महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज

Source: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished108 pages

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तृतीय विकास : ६९
अर्थ—कल्याणस्वरूपा, निर्मल, व्यापक अत्यन्तसूक्ष्म पराशक्ति रूप संवित्-देवी
शक्तिचक्र¹ को जन्म देती है । यह देवी प्राणों में परिणत जीवन-शक्ति है और तीन
छायाओं में सर्वत्र ईशन करती है—
[क] १. अघोरा—परानन्द अमृत स्वरूपा
२. घोरा—अन्तर्मुख आनन्द स्वरूपा
३. घोरतरी—बहिर्मुख संसार रूपा —महाघोरेश्वरी
[ख] अपने स्वरूप को छिपाने की चातुर्य-शक्ति —चण्डा
[ग] त्रुटि आदि शक्तिरूप काल का परिमाण करने वाली कालकर्षिणी, जो सृष्टि,
स्थिति और संहार रूप से काल का कर्षण करती है । —सृष्टिसंहारकारिणी
परा-शक्ति इडा, पिगला और सुषुम्णा मार्गों में वहन करने से 'त्रिवह', सोम, सूर्य
और अग्नि रूप होने से 'त्रिविध' तथा अतीत, वर्तमान और अनागत में स्थित होने से
'त्रिस्थ' कहलाती है ।
प्राण सम्बन्ध की अवधि तक ही शरीर रूप कञ्चुक भी ठहरता है, परन्तु संवित्-
स्वरूप में ठहरे परमयोगी के श्वास-उच्छ्वास स्वभाव से ही इस ज्ञान-क्रिया रूप विश्व
में संविन्मय होते हैं । प्राणों के साहचर्य से मितप्रमाता (जीव) कर्मों का पाश बनाता
है और फिर उसके अधीन होता है। पहले किये हुए संचित और मिश्र कर्मों से
प्रारब्ध-कर्म और उनके भोगने के लिए घर अर्थात् शरीर उत्पन्न होता है । प्रारब्ध
कर्मों का उनके भोगने से ही क्षय होता है अन्यथा नहीं । इसलिए इस तत्त्ववित् योगी
का शरीर प्रारब्ध के अनुसार ही ऐसे ठहरता है जैसे चक्र को घुमा कर उसके अन्तिम
कुछ घुमाव स्वयं ही कुछ देर तक देखने में आते हैं । स्वयं तो वह कर्म-पाश से मुक्त
स्वरूपसंविन्मय ही रहता है । वह देह पर दृष्टि कभी नहीं डालता है । श्रीमद् भागवत
में इस सिद्धयोगी की अवस्था का वर्णन इस श्लोक में है :
देहं च नश्वरमवस्थितमुत्थितं वा
सिद्धो न पश्यति यतोऽध्यगमत् स्वरूपम् ।
दैवादपेतमुत दैववशादुपेतं
वासो यथा परिकृतं मदिरामदान्धः ॥
(एकादशस्कन्द-१३-३६)
१. शक्तिचक्र में संवित्-देवी की शक्तियों के विकास का क्रम यों है :—
(क) खेचरी—अन्तःकरण के शक्तिचक्र का विकास
(ख) गोचरी—ज्ञानेन्द्रियों के शक्तिचक्र का विकास
(ग) दिग्धरी—कर्मेन्द्रियों के शक्तिचक्र का विकास
(घ) भूचरी—पंचमहाभूतों के शक्तिचक्र का विकास