Skip to content
SarvaKosh
शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

by महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज

Source: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished108 pages

Page 82 of 108

Read in context
Page 82

५८ : शिवसूत्र विमर्शं
करणशक्तिः स्वतोऽनुभवात् ॥३७॥
करणशक्तिः—विश्व की स्थिति और लय करने की शक्ति
स्वतोऽनुभवात्—अपने ही अनुभव के अन्तर्गत होती है ।
व्याख्या—जिस प्रकार साधारण जन को संकल्पों और स्वप्न आदि में सृष्टि और
लय करने की शक्ति अपने ही अनुभव से होती है, वैसे ही योग-युक्त सम्पन्न आत्मा
को विश्ववैचित्र्य के सम्पादन करने की शक्ति अपनी ही ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति
के अनुभव से सिद्ध है । इस शिवयोगी को असाधारण पदार्थों के निर्माण करने की
शक्ति अपने संपादन-सामर्थ्य से होती है, साधारण जन की तरह इन्द्रिय-सामर्थ्य से
नहीं ।
वैसे तो ब्रह्मा से लेकर कीटाणु तक किसी भी प्राणी की उल्लेखनरूप क्रियाशक्ति
और अवभासनरूप ज्ञानशक्ति स्वाभाविक१ हैं। ऐसा सम्भव होने पर किसी विषय पर
पूर्ण एकाग्रता से विमर्श किया जाय तो सर्वसाधारण इच्छित पदार्थ निर्माण भी हो
सकता है। इस विषय में विश्वामित्र आदि मुनियों की नूतन स्वर्ग सृष्टि२ की गाथाएँ
प्रसिद्ध हैं ।
‘ईश्वरप्रत्यभिज्ञा’ में इसी विचार के स्पष्ट अर्थ की कारिका इस प्रकार है :
अत एव यथाभीष्टसमुल्लेखावभासनात् ।
ज्ञानक्रिये स्फुटे एव सिद्धे सर्वस्य जीवतः ॥ (१-६-१०)
अर्थ—अतः योग-सिद्ध इस असाधारण आत्मा को विश्व में विचित्रता (सृष्टि और
संहार संपादन करने की शक्ति) स्वानुभव-सिद्ध होती है। यह संपादन-सामर्थ्य शिवयोगी
की तुर्यरूप स्वातन्त्र्य-शक्ति है जो उसे अपने ही अनुभव के अन्तर्गत होती है ॥३७॥
सम्बन्ध—क्योंकि यही तुर्यरूप स्वातन्त्र्यशक्ति इस बोधरूप प्रमाता (शिव-योगी
अथवा योगसिद्ध पुरुष) की स्वरूप-स्थिति का सार है, अतः जाग्रदादि अवस्थाओं में इस
पद के, मायाशक्ति से आच्छादित होने पर भी, इसी तुर्य से स्वरूप को उत्तेजित करने
की आवश्यकता साधक के लिए अभीष्ट है । इस विषय में अगले दो सूत्र हैं—
१. यैव चित् गगनाभोगे भूषणे भाति भास्करे ।
धराविवरकोशस्थे सैव चित् कीटकोदरे ॥
अर्थ—‘जो चिति आकाश-भूषण भगवान् सूर्य में भासती है वही चिति पृथ्वी के
बीच में बिल-कोश में ठहरे हुए कीड़े में विद्यमान है ।’
२. नूतन स्वर्ग सृष्टि—त्रिशंकु के लिए स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक के मध्य में विश्वामित्र
ने नूतन सृष्टि अपने योगबल से रची थी । यह बात पुराण-प्रसिद्ध है ।