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शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

by महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज

Source: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished108 pages

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तृतीय विकास : ५७
सम्बन्ध—परन्तु इस प्रकार के कर्म रूप जीव को जब कभी महेश्वर का अनर्गल
शक्तिपात होता है तो उसको सहज ही ज्ञानक्रिया का लाभ होता है और उसे स्वातन्त्र्य
योग का उदय होता है। फिर उसे—
भेदतिरस्कारे सर्गान्तरकर्मत्वम् ॥३६॥
भेदतिरस्कारे—संसार-दशारूप भेद के तिरस्कार होने (हटने) पर
सर्गान्तरकर्मत्वम्--विश्व की सृष्टि तथा संहार करने की क्षमता होती है।
व्याख्या—ऐसे योगिवर का देह, प्राण और पुर्यष्टक में अभिमान रूप भेद, चिद्धन
में डुबकी लगाने से हट जाता है। वह कला, विद्या, राग, काल और नियति, माया के
इन पांच कञ्चुकों से आवृत सकल, प्रलयाकल और विज्ञानाकल प्रमाताओं को स्वरूप
के उन्मेष द्वारा हटा कर मन्त्र (शुद्धविद्या), मन्त्रेश्वर (ईश्वर) और मन्त्रमहेश्वर
(सदाशिव) रूप अपने माहात्म्य को क्रम से प्राप्त करता है। इस प्रकार वह अपनी इच्छा
से प्रमाता तथा प्रमेय से ऊपर उठता है । अतः उसे कोई दूसरी ही वस्तु (शिवरूपता)
की क्षमता प्राप्त होती है ।
शिव का शक्तिपात किसी समय भी किसी पर होता है। इसके होने में अधिकारी
अनधिकारी का कोई विचार नहीं। यह व्यक्ति, समय और स्थान की विशेषता से
बाहर है क्योंकि शिव कर्म-निरपेक्ष है। उसमें कर्म का कोई विचार नहीं होता। अतः
शक्तिपात निरर्गल है। जिस किसी पर शिव का शक्तिपात हो उसे संसारदशा का
स्वयमेव तिरस्कार होता है। उसमें विश्व की सृष्टि तथा लय करने की क्षमता आती है
शक्ति संसार है और वह कर्म-सापेक्ष है। जीव फलभोगी है। अतः संसार में कर्म
करने से उनके फल अवश्यम्भावी होते हैं। परन्तु शक्ति-पात हुए योगी को कर्मों के
करने की आवश्यकता नहीं होती। यदि देह-निर्वाहिनार्थ कर्म करने भी पड़ें तो भी उसे
उनका कोई लेप नहीं होता। वह साधारण प्रमातृभाव और प्रमेयभाव से ऊपर उठ कर
शिवरूपता को प्राप्त करता है।
श्री स्वच्छन्द में कहा है :
'त्रिगुणेन तु जप्तेन स्वच्छन्दसदृशो भवेत् ।'
अर्थ—त्रैगुण्य से यहाँ अनेक गुणता उपलक्षण कहा है। अतः महामन्त्ररूप परिपूर्ण
अहंता भाव से अपने स्वभाव-परामर्श में रहने से योगी स्वच्छन्दनाथ शिव के समान
होता है।
अतः कर्मात्मा जीव भी कभी अनर्गल शक्तिपात से स्वच्छन्द-सादृश्य प्राप्त
करता है ॥३६॥
सम्बन्ध—प्रमेय-प्रमाण भाव से उठकर रहना इस योगी के लिए असम्भव नहीं है,
क्योंकि इसे—