शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation
by महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज
Source: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (origin)
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Read in contextतृतीय विकास : ५५
विश्व ही स्वशक्ति-चक्र का विकास होता है (स्व-शक्तिप्रचयोऽस्य विश्वम्—सूत्र ३-३०) ।
उसने देहादि अहंकार के महामोह को अतिक्रमण किया होता है। अतः उसे दूसरे लोगों
की तरह सुख-दुःख स्पर्श नहीं कर पाते । इसके विषय में स्पन्दशास्त्र में कहा है :
न दुःखं न सुखं यत्र न ग्राह्यो ग्राहको न च ।
न चास्ति मूढभावोऽपि तदस्ति परमार्थतः ॥ (१-५)
अर्थ—उसका स्वभाव ही होता है कि उसे सुख, दुःख, मूढता आदि भावों का स्पर्श
ही नहीं होता है क्योंकि उसका परप्रमातृभाव सदा उदय में होता है ।
सुख दुःख तो केवल संकल्प से पैदा होते हैं और क्षणभङ्गुर हैं । अतः वे शब्दादि
विषयों के समान आत्मस्वरूप से बाहर होते हैं ।
यहाँ प्रश्न किया जा सकता है : यदि इस योगी को सुख और दुःख स्पर्श नहीं
करते तो क्या वह पत्थर के समान संज्ञाहीन होता है ? इसका उत्तर अष्टावक्र जी ने
जनक के प्रति इस प्रकार दिया है :
निर्वासनो निरालम्बः स्वच्छो वै मुक्तबन्धनः ।
क्षिप्तः संस्कारवातेन चेष्टते शुष्कपर्णवत् ।।
(अष्टावक्रगीता—१२।२९)
अर्थ—ज्ञानी वासना रहित होता है। उसको किसी का आधार नहीं लेना पड़ता है ।
इस लिए परप्रमातृ स्वभाव में स्वाधीन होता है। ज्ञानी में सुख दुःख के मूल राग-द्वेष
नहीं होते हैं। परन्तु प्रारब्धानुसार जो प्राप्त होते हैं उनको अङ्गीकार करता है।
जिस प्रकार पृथ्वी पर पड़े हुए सूखे पत्तों में कहीं जाने की अथवा स्थित होने की वासना
(सामर्थ्य) नहीं होती है परन्तु जिस दिशा की ओर वायु चलता है उसी दिशा की
ओर वे पत्ते उड़ने लगते हैं ठीक उसी प्रकार यह योगिविराट् प्रारब्ध के अनुसार भोग-
चेष्टा करता है ।
इस योगि-देह के इन्द्रिय-वर्ग इसे विषयों की ओर नहीं ले जाते हैं अपितु
करणेश्वरियाँ बनकर इसकी सेवा करते हैं। अष्टावक्र जी राजर्षि जनक को दृष्टान्तपूर्वक
समझाते हैं—
निर्वासनं हरिं दृष्ट्वा तूष्णीं विषयदन्तिनः ।
पलायन्ते न शक्तास्ते सेवन्ते कृतचाटवः ॥
—(अष्टावक्रगीता : १८।४६)
अर्थ—वासना रहित पुरुषरूप सिंह को देखकर विषयरूपी हाथी असमर्थ होकर
चुपचाप भाग जाते हैं। फिर इस वासनारहित पुरुष की ओर आकर्षित होकर स्वयं
सेवा करते हैं ॥३३॥