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शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

by महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज

Source: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished108 pages

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५४ : शिवसूत्र विमर्शं
अर्थ—इस जगत् में कार्यता और कर्तृता नाम के दो भेद भोग्य और भोक्ता हैं । उन
में जो भोग्य रूप भेद है वह पैदा भी होता है और नष्ट भी । परन्तु भोक्ता रूप भेद
चिद्रूप होने से न कभी पैदा होता है और न कभी नष्ट ही । अतः वह नित्य है ।
और भी कहा है :
भोक्तैव भोग्यरूपेण सदा सर्वत्र संस्थितः
अर्थ—भोक्ता ही भोग्य के रूप में सदा और सब जगह ठहरा है ।
तत्सृष्ट्वा तस्मिन्नेव प्रविशत्
अर्थ—जगत् में नाना प्रकार की सृष्टि को रच कर स्वयं उस में प्रविष्ट हुआ ।
आगे स्पन्द शास्त्र में कार्यता के बारे में लिखा है—
कार्योन्मुखः प्रयत्नो यः केवलं सोऽत्र लुप्यते ।
तस्मिंल्लुप्ते विलुप्तोऽस्मीत्यबुधः प्रतिपद्यते ॥
न तु योऽन्तर्मुखो भावः सर्वज्ञत्वगुणास्पदम् ।
तस्य लोपः कदाचित्स्यादन्यस्यानुपलम्भनात् ॥ (१-१५, १६)
अर्थ—वेद्य वर्ग में कार्य संपादन करने का सामर्थ्य जो बाह्य इन्द्रियों के व्यापार से
ही होता है, समाधि दशा में उसका लोप हो जाता है । परन्तु अबुद्ध को इस प्रकार
इन्द्रियों के व्यापार का लोप होने पर यह मान्यता होती है कि 'मैं नहीं हूँ' । वह यह
नहीं जानता कि यह अभाव परामर्श ही साक्षी होने से स्वात्मा का स्थिरीभाव बता
देता है । परन्तु जो परप्रमातृपद सर्वज्ञत्व गुण का स्थान है उसका कभी लोप नहीं
होता है क्योंकि वहाँ भिन्न वेद्यवर्ग का ज्ञान नहीं होता ॥३२॥
सम्बन्ध—विश्व की सृष्टि, स्थिति और लय में निष्कम्प योगी को—
सुखासुखयोर्बहिर्मननम् ॥३३॥
सुखासुखयोः--(अन्य पुस्तकों में पाठान्तर 'सुखदुःखयो') वेद्य पदार्थों के
स्पर्श से हुए सुख और दुःख
मननम्—का जानना
बहिः--(नीले पीले आदि की तरह इदन्ता का आभास रूप होने से) बहि-
र्भाव में ही होता है ।
व्याख्या—देहप्रमातृता, प्राणप्रमातृता और पुर्यष्टक-प्रमातृता से उत्तीर्ण हुए इस
योगिराज को वेद्यवर्ग के स्पर्श पर जय प्राप्त होती है । वह वेद्य-स्पर्श से हुए सुख और
दुःखों को इदन्ता का आभास रूप ही जानता है जैसे नीला, पीला आदि बहिर्भाव में ही
होते हैं । साधारण जन की अहन्ता वेद्य-पदार्थों में ही होती है इस कारण वह इनके
स्पर्श से मान बैठता है कि 'मैं सुखी हूँ' या 'दुःखी हूँ' । परन्तु इस धीमान् के लिए