शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation
by महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज
Source: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (origin)
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Read in context४८ : शिवसूत्र विमर्श
यही बात श्रीत्रिकसार में इस प्रकार वर्णित है :
देहोत्थिताभिर्मुद्राभिर्यः सदा मुद्रितो बुधः ।
स तु मुद्राधरः प्रोक्तः शेषा वै अस्थिधारकाः ॥
अर्थ—शरीर-कला की साधारण क्रियाओं में वह बुद्धिकौशलयुक्त योगी सदा 'अन्त-
र्लक्ष्यबहिर्दृष्टि' इस प्रकार शाम्भवी मुद्रा से मुद्रित होता है। उसी को मुद्राधर अर्थात्
शिव कहा है। शेष तो सब प्राणी हड्डियों के पिञ्जर को ही धारणं करते हैं।
इस संसिद्धयोगी के आत्मज्ञान का फल आचार्य शङ्कर विवेकचूडामणि में इस प्रकार
कहते हैं :
संसिद्धस्य फलं त्वेतज्जीवन्मुक्तस्य योगिनः ।
बहिरन्तः सदानन्दरसास्वादनमात्मनि ॥४१९॥
अर्थ—आत्मज्ञान में सम्यक् सिद्धि प्राप्त किए हुए जीवन्मुक्त योगी को यही फल
मिलता है कि अपने आत्मा के नित्यानन्दरस का बाहर-भीतर निरन्तर आस्वादन
किया करें।
इस प्रकार बाहर-भीतर नित्यानन्दरस का निरन्तर आस्वादन करना ही परा-
भक्ति है अर्थात् शिव-भक्ति के अमृत से पूर्ण शरीर में जो भी योगी की स्थिति होती
है वही उसका व्रत है। इस स्थिति की पुष्टि के लिए भगवान् उत्पलदेव शिस्तोत्रावली
में भगवान् शिव से यह अलौकिक प्रार्थना करते हैं :
अन्तरुल्लसदच्छाच्छभक्तिपीयूषपोषितम् ।
भवत्पूजोपयोगाय शरीरमिदमस्तु मे ॥१७-२६॥
अर्थ—हे शङ्कर ! भीतर संवित् पद में मग्न हुए अत्यन्त निर्मल भक्तिपीयूष अर्थात्
समावेश-अमृत से पाला-पोसा गया यह मेरा शरीर आप की पूजा के काम आ जाये
अर्थात् आप चिदानन्दघन में ही विलीन हो जाय।
स्वरूप-विमर्श रूप ज्ञान और परा-भक्ति पर्यायवाची हैं क्योंकि ये एक दूसरे पर
आश्रित हैं। पराभक्ति स्वरूप भगवान् उत्पलदेव अलौकिक भक्तिरसपूर्ण शिवस्तोत्रावली
में कहते हैं :
यद्यथास्थितपदार्थदर्शनं
युष्मदर्चनमहोत्सवश्च यः ।
युग्ममेतदितरेतराश्रयं
भक्तिशालिषु सदा विजृम्भते ॥१३-७॥
अर्थ—(ज्ञान काल में) सभी सांसारिक वस्तुओं को आप चिद्रूप से अभिन्न देखना
और (ध्यान, दर्शन और स्पर्शन-भक्तिकाल में) आप की पूजा का उत्सव, यह दोनों बातें
एक दूसरे पर आश्रित रहती हैं। आप के अनन्य भक्तों में इन दोनों बातों का (क्रम-
मुद्रा से) सदा विकास रहता है।