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शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

by महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज

Source: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished108 pages

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तृतीय विकास : ४७
शरीरवृत्तिर्व्रतम् ॥२६॥
शरीरवृत्तिः--(शिवोऽहं-मैं शिव हूँ, इस भावना में ठहरे इस योगी की)
शरीर में स्थिति
व्रतम्--जीवन के साधारण नियम के अनुसार ही होती है।
व्याख्या—अब इस संसिद्धयोगी का आत्मसंयम प्रारब्ध के अनुसार साधारण जीवन
के प्रवाह के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता है। शिवोऽहं भावना में अभ्यास-घनता के
कारण स्थिर होने से इस योगी को देह-वासना का सम्बन्ध छूटा होता है। केवल प्रारब्ध
की परिसमाप्ति तक उसे देह में ठहरना पड़ता है। देह, प्राण आदि में ठहरते हुए भी
उसे शिव-समावेश बना रहता है। इस का प्रमाण श्री स्वच्छन्द शास्त्र में मिलता है :
सुप्रदीप्ते यथा वह्नौ शिखा दृश्येत चाम्बरे ।
देहप्राणस्थितोऽप्यात्मा तद्वल्लीयेत तत्पदे ॥
अर्थ—जिस प्रकार (काष्ठादि ढेर में लगी) अग्नि की शिखा आकाश में लीन होती
देखी जाती है, उसी प्रकार देह, प्राणादि में ठहरी हुई संसिद्धयोगी की आत्मा तत्पद
अर्थात् शिवस्वरूप में लीन होती है।
अरणिमन्थन की युक्ति से अग्नि के प्रज्वलित होने पर जैसे उसकी ज्वाला-दाह्य-
वस्तु को जलाकर आकाश में दिखाई देती है और वहाँ लीन होकर तदात्मभाव को
प्राप्त होती है वैसे ही दिव्यकरण और मन्त्ररूप अरणि के उत्तेजित होने से योगी के
देह में प्राण प्रदीप्त होकर मध्यनाडी में ऊर्ध्ववाही होकर उदान-वह्नि में प्रज्वलित
होता है।
इस योगी की आत्मा जो देह में ठहरी हुई है, केवल शुद्धविज्ञानरूप अग्नि के समान
समना के अन्त तक देहरूप लकड़ी को जलाकर तुर्यातीत पद में लीन होती है अर्थात्
उपाधिरहित परमशिव के साथ एक होती है।
अतः योगी के देह में स्थिति प्रारब्ध कर्मानुसार ही रहती है। उसके लिए साधा-
रण कर्म करने के अतिरिक्त और कोई व्रत नहीं होता है। वह केवल अविकारी होकर
विकारी सा प्रतीत होता है। विवेक-चूड़ामणि में भगवान् आद्य शङ्कराचार्य कहते हैं :
उपाधिसम्बन्धवशात्परात्मा
ह्यु पाधिधर्माननुभाति तद्गुणः
अयोविकारानविकारि वह्निव-
त्सदैकरूपोऽपि परः स्वभावात् ॥१९३॥
अर्थ—वह परात्मा स्वरूप से सदा एक रूप ही है तथापि उपाधि के सम्बन्ध से उसके
गुणों से युक्त-सा होकर उसो के धर्मों को प्रकाशित करता है जिस प्रकार कि लोहे के
विकारों में व्याप्त हुई अविकारी अग्नि विकारी सी प्रतीत होती है।