शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation
by महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज
Source: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (origin)
Page 61 of 108
Read in contextतृतीय विकास : ३७
अर्थ-सब वेद्य-उल्लास को शिव से अभिन्न स्वात्मा के ऐक्य-परामर्श से उस (योगी)
को जल, अग्नि आदि तत्त्व, हिंसा करने वाले जीव और शरीर में ठहरे शब्दराशियों के
वर्ण सदा वश में रहते हैं ॥१३॥
सम्बन्ध—ऐसे योगी का स्वातन्त्र्य इस प्रकार है।
यथा तत्र तथान्यत्र ॥१४॥
यथा—जैसे
तत्र—तुर्य अवस्था में (योगी को सहजभाव अर्थात् समाहित भाव प्राप्त
होता है)
तथा—वैसे ही
अन्यत्र—स्वरूप बाह्य जाग्रत् आदि सब अवस्थाओं में भी (वह सदा समा-
हित रहता है)।
व्याख्या—शिवव्याप्ति-सम्पन्न योगी को जैसे स्वरूप में अभिव्यक्ति होती है वैसे ही
उसे जाग्रत् तथा स्वप्न अवस्थाओं में भी स्वरूप-प्रथन होता है, क्योंकि सदा समाहित
रहने में वह युक्ति-कुशल होता है। वह दूसरे के शरीर में भी संक्रमण कर सकता है।
तात्पर्य यह है कि जिस किसी अवस्था में योगी हो उसमें स्वरूपस्थित रहने की
स्वतन्त्रता प्राप्त होती है ॥१४॥
सम्बन्ध—परन्तु ऐसे उत्कृष्ट योगी को भी उदासीन भाव से नहीं रहना चाहिए,
अपितु—
बीजावधानम् ॥१५॥
बीज--विश्वसंवित् में
अवधानम्--पुनः पुनः चित्त
(कर्त्तव्यम्)—लगाना चाहिए।
व्याख्या—उसे विश्वकारण अर्थात् स्फुरण-स्वरूप परशक्ति में पुनः पुनः चित्त को
निमज्जित करना चाहिए। जैसे विज्ञानभैरव के १३७ वें श्लोक में कहा है :
ज्ञानप्रकाशकं सर्वं सर्वेणात्मा प्रकाशकः ।
एकमेकस्वभावत्वात् ज्ञानं ज्ञेयं विभाज्यते ॥
अर्थ—सर्व शब्द वाच्य ज्ञेयजात ज्ञान से पृथक् नहीं है और प्रकाशक ज्ञान आत्मा से
भिन्न नहीं है। इस प्रकार ऐक्य का भावना करनी चाहिए।
यहाँ योगी को स्वरूपस्थिति में सदा सावधान रहने का संकेत है जिससे वह मित-
सिद्धियों में कभी उलझ न जाये ॥१५॥
सम्बन्ध—ऐसा होने पर यह योगी शाक्तबल का लाभ करके शाम्भव पद में
विश्रान्ति पाने लगता है। अतः कहा है—