शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation
by महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज
Source: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (origin)
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Read in context३६ : शिवसूत्र विमर्श
अर्थ—जहाँ जहाँ चिन्मरीचियों का साक्षात्कार होता है वहाँ वहाँ प्रभु ही प्रकट
होते हैं ॥११॥
सम्बन्ध—नाटक में सात्त्विक अभिनय की सिद्धि बुद्धि की कुशलता से ही मिलती
है। इसी प्रकार योगी को जगदानन्द की प्राप्ति विशेष सात्त्विक बुद्धि से होती है।
धीवशात् सत्त्वसिद्धिः ॥१२॥
धीवशात्—(ऋतम्भरा प्रज्ञा) शुद्ध-सत्त्व-बुद्धि से
सत्त्वसिद्धिः—आन्तर संवित्-स्पन्दन की अभिव्यक्ति होती है।
व्याख्या—तात्त्विक स्वरूप का विमर्श करने में चतुर बुद्धि को धी अर्थात् ऋतम्भरा
प्रज्ञा कहते हैं। जैसे नाटक में अभिनय की सफलता कुशल बुद्धि पर ही निर्भर होती
है वैसे ही शुद्ध-सत्त्व में ठहरी हुई युक्ति-कुशल बुद्धि के द्वारा ही योगी को आन्तर
संवित्-स्पन्द की अभिव्यक्ति सफलता-पूर्वक होती है ॥१२॥
सम्बन्ध—इस सात्त्विक अभिनय में कुशलता के प्राप्त होने पर इस योगी को
स्वतन्त्रता की सिद्धि होती है।
सिद्धः स्वतन्त्रभावः ॥१३॥
स्वतन्त्रभाव : -- (जाग्रत् और स्वप्न में इस योगी को) सारे विश्व को वश
करने की स्वतन्त्रता
सिद्ध : -- सम्पन्न ही है।
व्याख्या—युक्ति-कुशल बुद्धि अर्थात् ऋतम्भरा प्रज्ञा का उदय होने पर शिव-व्याप्ति
प्राप्त योगी को स्वाभाविक ज्ञानरूपता अथवा सहजभावरूप स्वातन्त्र्य सम्पन्न होता है।
सर्व-कर्तृत्वादि-रूप स्वातन्त्र्य उपलब्ध होता है। सारा विश्व उसके वश में होता है।
इसका तात्पर्य इस प्रकार है—
(क) परदशा में जाग्रत् से स्वप्न अवस्था तक जब चाहे समाधि में बैठ सकता है।
स्वप्न में भी स्वरूप-स्थित होकर स्वेच्छा से जागता है।
(ख) परापर स्वातन्त्र्य दशा में जिस किसी अवस्था में जो कोई इच्छा करता है वह उसे
पूर्ण होती है। जाग्रत् अवस्था में यदि किसी को शाप दे या वरदान दे तो वह तत्क्षण
सफल होता है। स्वप्न अवस्था में यदि चाहे कि 'मैं इस प्रकार स्वप्न देखूं" तो उसकी
इच्छापूर्ति तुरन्त होती है। यही उसका जाग्रत-स्वप्न अवस्थाओं में स्वातन्त्र्य है। ऐसे
योगी को सुषुप्ति अवस्था नहीं होती है वह तो तुर्यावस्था में बदल जाती है।
श्री स्वच्छन्द तन्त्र में कहा है :
सर्वतत्त्वानि भूतानि मन्त्रवर्णाश्च ये स्मृताः ।
नित्यं तस्य वशास्ते वै शिवभावनया सदा ॥
—(प० ७ श्लोक २४२)