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शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

by महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज

Source: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished108 pages

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प्रथम विकास : ३
सम्बन्ध—यही आणवमल संसार के अङ्कुर का कारण (कार्ममल) बन जाता है
जिसकी ओर अगले सूत्र में संकेत किया है।
योनिवर्गः कलाशरीरम् ॥३॥
योनि—भेदप्रथा की हेतु माया (का)
वर्गः—प्रपञ्च अर्थात् फैलना (यह मायीयमलस्वरूप बन्धन है और)
कलाशरीरम्—(कलातत्त्व से पृथ्वी तत्त्व तक शुभाशुभवासनामय) जो
व्यापार है वह भी बन्धन का हेतु है।
व्याख्या—माया का समूह ही भेदप्रथा का हेतु है। (भिन्नवेद्यप्रथा) वेद्यवर्ग में
भिन्नता के ज्ञान को मायीयमल कहते हैं। अतः 'यह', 'वह', 'मैं' आदि का ज्ञान भी
बन्धन है। इस स्वरूप-संकोच शक्ति को माया-शक्ति कहते हैं।
जीव में जब 'मैं सुखी हूँ', 'मैं दुःखी हूँ' इत्यादि शुभ और अशुभ वासनायें पैदा
होती हैं तो इसे कार्ममल कहते हैं। इसमें जन्म और भोग को देने वाले कर्त्ता आत्मा
का अबोध होता है। यह भी जीव के बन्धन का कारण है ॥३॥
सम्बन्ध—अब इन तीनों मलों का बन्धकत्व कहते हैं।
ज्ञानाधिष्ठानं मातृका ॥ ४ ॥
ज्ञान—द्वैतज्ञान का
अधिष्ठानं—आधार (अर्थात् आणवमल, मायीयमल और कार्ममलरूप
कारण)
मातृका—बहिर्मुखता को प्राप्त हुई संवित् (अर्थात् अज्ञाता-माता) है।
व्याख्या—तीन मलों के आवरण से जीव को द्वैतज्ञान की दृढ़ता होती है। इससे
वह ऐसे बन्धन में पड़ जाता है कि स्वात्म-विश्रान्तिरूप अन्तर्मुख-भाव से निरन्तर अलग
रहता है और बहिर्मुखता के ज्ञान में भूला रहता है। यह सब अज्ञात संवित् के कारण
ही होता है। अतः जीव बन्धन में रहता है ॥४॥
सम्बन्ध—अब इस बन्धन के सम्बन्ध से छूटने का उपाय (जो मलत्रय को हटाना
है) कहते हैं।
उद्यमो भैरवः ॥ ५ ॥
उद्यमः—मलत्रय को हटाने का उद्योग।
भैरवः—भैरव रूप (अर्थात् स्वस्वरूप को प्रकट करने का हेतु) है।