शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation
by महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज
Source: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (origin)
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Read in context२ : शिवसूत्र विमर्श
चैतन्य (चिति) ही आत्मा है । अतः चैतन्य और आत्मा में राहु के शिर की
तरह कल्पना से ही भेद दिखाई देता है । वास्तव में कोई भेद नहीं ।
जो चेत्यमान न हो ऐसा स्वभाव न कोई हो सकता है, न किसी का हो सकता है
और न कभी हो सकता है । अतः चेत्यमान स्वप्रकाश चिदेकरस चैतन्य ही स्वभाव है,
वही आत्मा है । जब चैतन्य समस्त विश्व का स्वभाव है तो उसकी साधना ही क्या
और उसके लिये उपाय ही कैसा । इसमें प्रमाण की कोई आवश्यकता ही नहीं, क्योंकि
चैतन्य सदा स्वयंप्रकाश चिद्रूप है और उस पर कोई आवरण नहीं डाल सकता है ।
श्री त्रिकहृदय में कहा है :
"स्वपदा स्वशिरश्छायां यद्वल्लङ्घितुमीहते ।
पादोद्देशे शिरो न स्यात्तथैवं बैन्दवी कला ॥"
अर्थ—ज्यों ज्यों अपना पैर अपने ही सिर की छाया को लाँघने की इच्छा से आगे
बढ़ता है त्यों त्यों सिर की छाया आगे और आगे होती जाती है । यही बात बैन्दवी
कला (चिति) के विषय में है । चिति को, उसी से बनी, बुद्धि आदि से समझना
असंभव है । और भी, स्पन्दकारिका में :
"तेन शब्दार्थचिन्तासु न सावस्था न यः शिवः ।
भोक्तैव भोग्यभावेन सदा सर्वत्र संस्थितः ॥"
अर्थ—सर्वात्मक स्वभाव से शब्द और अर्थ की चिन्ता में वह कोई अवस्था नहीं
है जो शिवभाव को प्रकट न करती हो । अतः भोक्ता ही भोग्यरूप में सदा और
सर्वत्र ठहरा है ।
यह स्वरूप-विकास-शक्ति ही स्वातन्त्र्य शक्ति है । अतः शिव का स्पन्दतत्त्वरूप
चैतन्य सदा स्वयंप्रकाश परमार्थसत् है ॥१॥
सम्बन्ध—आत्मा का लक्षण बता कर अब जीव के बन्धन का कारण अगले दो सूत्रों
में बताते हैं ।
ज्ञानं बन्धः ॥२॥
ज्ञानं—अनात्मा (अर्थात् देह, प्राण, पुर्यष्टकादि रूप) को ही आत्मा जानना
बन्धः—बन्धन है ।
व्याख्या—विषयों का ज्ञान होना ही बन्धन है । इस प्रकार जिस अवस्था में द्वैत
का ज्ञान होता है वह अज्ञान है और बन्धन का कारण है । ऐसा आणवमल के कारण
होता है । आत्मा में जब अपूर्णता का अनुभव होता है तब इसे आणवमल कहते हैं ।
इसी से आत्मा अणु अर्थात् जीव कहलाता है । वह देह, प्राण, पुर्यष्टक आदि को ही
आत्मा जानता है जिससे उसे विषयों का ही ज्ञान रहता है ॥२॥