शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)
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Read in contextकां० १, अ० ४, ब्रा० २, कं० १०-१९ शतपथब्राह्मण / ७६
इसी से सब यज्ञों को प्राण देते हैं अर्थात् पाक-यज्ञ (खाना पकाने के यज्ञ) को और दूसरे यज्ञों
को । इसलिए कहा, 'प्रणीर्यज्ञानाम्' ॥१०॥
'रथीरध्वराणाम्'—'रथ बनकर देवों के यज्ञ को ले जाता है'। इसलिए कहा, 'रथी-
रध्वराणाम्' ॥११॥
अब कहा—'अतूर्तो होता तूर्णिर्हव्यवाट्'—'इसको राक्षस नहीं रोक सकते, इसलिए
कहा 'अतूर्तः' अर्थात् न रुकनेवाला होता । सब पापियों को परास्त कर देता है इसलिये कहा
'तूर्णिर्हव्यवाट्', अर्थात् ऐसा हव्य ले-जानेवाला जो दूसरों को परास्त कर देता है ॥१२॥
अब कहा—'आस्यात्त्रं जुहूद्देवानाम्'—'देवों के खाने की थाली या मुख-पात्र' । यह
अग्नि जो है वह देवों का पात्र है । इसलिए अग्नि में सब देवों के लिए हवि देते हैं, क्योंकि वह
देवपात्र है, निश्चय करके जो इस बात को जानता है वह उसके पात्र को ले लेता है जिसके पात्र
को वह चाहता है ॥१३॥
अब कहा—'चमसो देवपानः'—'देवो के पीने का चमचा' । इसी चमचे अर्थात् अग्नि से
देव भोजन करते हैं इसलिए इसको कहा 'देवपानः' ॥१४॥
अब कहा—'अराँऽइवाग्ने नेमिर्देवांस्त्वं परिभूरसि'—'हे अग्नि, जिस प्रकार पहिये की
परिधि अरों के चारों ओर लगी रहती है उसी प्रकार तू देवों के चारों ओर है' ॥१५॥
अब कहा—'आवह देवान् यजमानाय'—'देवों को यजमान के लिए बुला ।' यह इसलिये
कहा कि अग्नि देवों को यज्ञ के लिए बुलावे । अब कहा—'अग्निमग्नऽआवह'—'हे अग्नि ! अग्नि
को बुला ।' यह इसलिए कहा कि अग्नि के लिए जो 'आयाज्य भाग' था उस तक अग्नि को लाया
जाय । अब कहा—'सोममावह'—'सोम को ला', जिससे यह सोम के आयाज्य भाग को सोम
तक लावे । अब कहा—'अग्निमावह'—'अग्नि को ला ।' यह इसलिए कहा कि अग्नि के लिए
जो दोनों समय (दर्श और पूर्णमास यज्ञों में) आवश्यक पुरोडाश है उस तक अग्नि को
लावे ॥१६॥
इसी प्रकार और देवों के लिए भी । अब कहा—'देवाँऽआज्यपाँऽआवह'—'आज्य के
पीनेवाले देवों को ला ।' यह इसलिए कहा कि प्रयाज और अनुयाज को ला सके (पहली
आहुति को प्रयाज और पिछली को अनुयाज कहते हैं) क्योंकि प्रयाज और अनुयाज ही आज्य
के पान करनेवाले देव हैं। अब कहा—'अग्नि ँ होत्रायावह'—'अग्नि को होत्र के लिए ला ।' यह
इसलिए कहा कि अग्नि को होता के लिए लावे । अब कहा—'स्वं महिमानमावह'—'अपनी
महिमा को ला ।' यह इसलिए कहा कि अपनी महिमा को ला सके । वाणी ही इसकी अपनी
महिमा है। इसके कहने का तात्पर्य हुआ 'अपनी वाणी को ला' । अब कहा—'आ च वह जातवेदः
सुयजा च यज'—'हे जातवेद अग्नि, (देवों को) ला और अच्छे प्रकार यज्ञ कर ।' जिस-जिस
देवता को लाने के लिए कहता है उस-उसको लाने के लिए आदेश करता है । 'सुयजा' कहने से
तात्पर्य है यथाविधि यज्ञ करना ॥१७॥
वह खड़े-खड़े पढ़ता है। क्योंकि वह (द्यौलोक) है जिसके लिए पढ़ता है, इसलिए खड़े-
खड़े पढ़ता है (अर्थात् दूर की चीज को खड़े होकर बुलाते हैं। द्यौ दूर है। उसके बुलाने के लिए
खड़ा हो जाना चाहिए ॥१८॥
याज्य आहुति को बैठकर अर्पित करता है। यह (अर्थात् पृथिवी) ही याज्य है । इस-
लिए याज्य को खड़े-खड़े न पढ़े। चूंकि याज्य ही यह है इसलिए बैठकर ही याज्य को पढ़ता
है । ('असौ' अर्थात् 'वह' का अर्थ है 'द्यौ' । 'इयं' अर्थात् 'यह' का अर्थ है पृथिवी) ॥१९॥