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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

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का० १, अ० ४, ब्रा० १, क० १५-२५ शतपथब्राह्मण / ७१
आस्वादन नहीं किया था ॥१५॥
अब तो यह बहुत उपजाऊ है क्योंकि ब्राह्मणों ने यज्ञ करके उसको अग्नि को चखा दिया
है। गर्मी के अगले दिनों में भी (वह नदी) खूब बहती है। अग्नि वैश्वानर ने इससे दग्ध नहीं
किया था। अतः यहाँ ठण्डक बहुत होती है ॥१६॥
विदेघ माथव ने अग्नि से पूछा—"मैं कहाँ रहूँ ?"—"इस नदी के पूर्व की ओर तेरा घर
हो", ऐसा अग्नि ने उत्तर दिया। अब तक यह नदी कोसल और विदेह देशों के बीच की सीमा
है। क्योंकि यह माथव की सन्तान हैं ॥१७॥
अब गोतम राहूगण ने राजा से पूछा—"मैंने तुमको बुलाया। तुम क्यों नहीं बोले ?"
उसने कहा—"मेरे मुंह में अग्नि वैश्वानर था। कहीं यह गिर न पड़े, इसलिए मैं नहीं
बोला" ॥१८॥
गोतम ने पूछा—"फिर यह क्या हुआ ?" राजा ने उत्तर दिया—"जब तुमने मंत्र पढ़े
और घी का नाम ही लिया कि अग्नि वैश्वानर जल उठा और मैं उसको मुख में न रख सका।
वह पृथिवी पर निकल पड़ा" ॥१९॥
इसलिए सामिधेनियों में जो घृत शब्द है वह अग्नि जलाने के लिए बड़ा उपयुक्त है।
इन्हीं सामिधेनियों को पढ़कर वह अग्नि को जलाता है और यजमान को शक्ति देता है ॥२०॥
अब (वह शब्द) है 'घृताच्या', अर्थात् घी से भरे (चमचे) से। 'देवान् जिगाति सुम्नयुः'—
'शान्ति का इच्छुक वह देवों के पास आता है'; यजमान सुम्नयुः (शान्ति का इच्छुक) है। वह
देवों के पास आना चाहता है। इसीलिए कहा 'देवान् जिगाति सुम्नयुः'। यह आग्नेयी ऋचा
अनिरुक्त (अनियत) है। 'सब' भी अनियत होता है। अतः अनिरुक्त ऋचा पढ़कर 'सब' का
सम्पादन करता है ॥२१॥
अब कहता है कि, 'अग्न आ याहि वीतये'—'अग्नि, यज्ञ की वृद्धि के लिए आ' (यह
दूसरी सामिधेनी है) वृद्धि या फैलाव के लिए। पहले लोक मिले हुए थे। हम आकाश को इस
प्रकार (हाथ बढ़ाकर) छू सकते थे ॥२२॥
देवों ने चाहा—"ये लोक दूर-दूर कैसे हों ? कैसे हमको अधिक आकाश मिले ?" यह
कहकर उन्होंने ये तीन अक्षरों का 'वीतये' शब्द उच्चारण किया। यह कहते ही लोक दूर-दूर हो
गए। देवों को दूर-दूर जगह मिल गई। जो इस रहस्य को समझकर 'वीतये' कहता है, उसके
लिए भी दूर-दूर अवकाश मिल जाता है ॥२३॥
जब वह कहता है 'गृणानो हव्य दातये'—'हव्य देनेवाले के लिए' तो हव्य देनेवाला
यजमान है। यजमान के लिए ही यह कहा गया। 'निहोता सत्सि बर्हिषि'—'होता आसन पर
बैठता है।' 'होता' अग्नि है। बर्हि से आच्छादित वेदी आसन है। यह जगत् बर्हि है। अग्नि को
इस जगत् में स्थापित करता है। जगत् के कल्याण के लिए अग्नि यहाँ स्थापित की जाती है।
जो इस रहस्य को समझता है और जिसके लिए यह सामिधेनी पढ़ी जाती है, उसकी इस लोक में
विजय होती है ॥२४॥
(अब तीसरी सामिधेनी) 'तं त्वा समिद्भिङ्गिरः'—'अङ्गिरस, तेरे लिए समिधाओं
से'; आंगिरस अग्नि है; 'घृतेन वर्द्धयामसि'—घी से हम बढ़ाते हैं। 'घृत' अग्नि जलाने के लिए