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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

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Page 87

कां० १, अ० ४, ब्रा० १, कं० ५-१५ शतपथब्राह्मण / ६६
'आ' और 'प्र' कहने का एक कारण और भी हो सकता है। 'प्र' प्राण है और 'आ'
उदान। इस प्रकार प्राण और उदान को धारण कराता है। इसलिए 'आ' और 'प्र' का प्रयोग
करता है ॥५॥
'आ' और 'प्र' कहने का एक कारण और भी हो सकता है। 'प्र' से वीर्य सींचा जाता
है, 'आ' से सन्तान उत्पन्न होती है। 'प्र' से पशु चरने के लिए जाते हैं, 'आ' से घर लौटते
हैं। वस्तुतः संसार में हर एक वस्तु आती और जाती है। इसलिए 'आ' और 'प्र' का प्रयोग
करता है ॥६॥
वह कहता है 'प्र वो वाजा अभिद्यवः'–“आपके अन्न द्यौलोक को जावें।” यह हुआ 'प्र'
या जाना। अब कहता है 'अग्न आ याहि वीतये'—‘‘हे अग्नि, वृद्धि के लिए आ !” इससे 'आ'
या आना हुआ ॥७॥
कुछ का कहना है कि इन दोनों से 'प्र' अर्थात् जाने का ही अर्थ निकलता है। परन्तु यह
तो साधारण बुद्धि में आता नहीं। वस्तुतः 'प्र वो वाजा अभिद्यवः' से जाना ही अभीष्ट है और
'अग्न आ याहि वीतये' से आना ॥८॥
वह (पहली सामिधेनी को) पढ़ता है, 'प्र वो वाजा अभिद्यवः', इससे जाना अभिप्रेत है।
वाज कहते हैं अन्न को। इसके पाठ से अन्न की प्राप्ति होती है। 'अभिद्यवः' से अर्द्धमास का अर्थ
निकलता है, क्योंकि अर्द्धमास द्यौलोक को जाते हैं। अब कहता है, 'हे हवि वालो !' हवि वाले
पशु होते हैं। इस प्रकार पशुओं की प्राप्ति कराता है ॥६॥
अब वह कहता है 'घृताची'। विदेघ का राजा माथव अपने मुख में वैश्वानर अग्नि
रखता था। उसका राहूगण गौतम पुरोहित था। पुरोहित ने पुकारा तो वह न बोला कि कहीं
मेरे मुख से अग्नि निकल न पड़े ॥१०॥
तब उस पुरोहित ने उसका (ऋग्वेद ५।२६।३) से आह्वान किया—'वीतिहोत्रं त्वा कवे
द्युमन्तं समिधीमहि । अग्ने बृहन्तमध्वरे'—'हे बुद्धिमान्, बड़े, प्रकाशवाले और हवन में प्रिय
अग्नि ! हम तुझको यज्ञ में बुलाते हैं' हे विदेघ ! ॥११॥
राजा ने कुछ उत्तर नहीं दिया, तब उसने आगे पढ़ा (ऋ० ८।४४।१७) —'उदग्ने शुच-
यस्तव शुक्रा भ्राजन्त ईरते। तव ज्योतींष्यर्चयः' विदेघ इति-'हे अग्नि, अपनी चमकीली, प्रकाश-
युक्त ज्योतियों को ऊपर को फेंक !' ओ विदेघ ! ॥१२॥
वह तब भी न बोला। तब पुरोहित ने आगे पढ़ा—'तं त्वा घृतस्नवीमहे चित्र भानो
स्वर्दृशं देवाँ आ वीतये वह।' यह मंत्र पूरा पढ़ने भी न पाया, 'घृत' शब्द तक ही आया था कि
अग्नि वैश्वानर जल उठा। वह अपने मुख में न रख सका। अग्नि उसके मुंह से निकलकर पृथिवी
पर आ पड़ा ॥१३॥
विदेघ माथव उस समय सरस्वती के किनारे पर था। उस समय अग्नि जलते-जलते पूर्व
की ओर बढ़ा। गौतम राहूगण और विदेघ माथव उस जलते हुए अग्नि के पीछे-पीछे चले।
अग्नि ने इन सब नदियों को सुखा दिया। एक नदी सदानीरा उत्तरी पहाड़ से निकलती है। उसे
वह न सुखा सका। ब्राह्मण लोग पहले इस नदी को पार नहीं करते थे, यह सोचकर कि अग्नि
वैश्वानर ने इसको नहीं जलाया ॥१४॥
परन्तु आजकल बहुत-से ब्राह्मण इस नदी के पूर्व की ओर रहते हैं। उस समय सदानीरा
के पूर्व की भूमि ऊसर पड़ी थी। उसमें दलदल बहुत था, क्योंकि अग्नि वैश्वानर ने उसका