शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)
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Read in contextकां० १, अ० ४, ब्रा० १, कं० १-४ शतपथब्राह्मण / ६७
समझता है उसी के लिए वे (इक्कीस मंत्र) बोलते हैं। परन्तु यह तो मीमांसा मात्र है। इक्कीस
मंत्र बोले नहीं जाते ॥१२॥
पहले मंत्र को तीन बार और पिछले को तीन बार एक साँस में पढ़ना चाहिए। तीन ही
ये लोक हैं। अतः वह इन तीनों लोकों को तानता है। पुरुष में तीन प्राण होते हैं। ऐसा करने
से उसका जीवन बढ़ जाता है। (मृत्यु) उसको बीच से काटता नहीं ॥१३॥
होता को चाहिए कि बिना बीच में तोड़े हुए जितनी-भर उसकी शक्ति हो उससे मंत्रों
को पढ़ता रहे। बीच में साँस तोड़ देने का अर्थ यह है कि यज्ञ का अनादर किया गया। बिना साँस
तोड़े लगातार पढ़ने से यह पाप नहीं लगता ॥१४॥
यदि वह ऐसा करना न चाहे तो एक-एक मंत्र को ही बिना साँस तोड़े बोले। इस प्रकार
वह एक-एक करके लोकों की प्राप्ति करेगा। वह साँस इसलिए लेता है कि गायत्री प्राण है। पूरी
गायत्री पढ़कर मानो वह यजमान के लिए पूरे प्राण का सम्पादन करता है। इसलिए उसको
एक-एक मंत्र बिना साँस तोड़े पढ़ने चाहिएँ ॥१५॥
उनको बराबर बिना तोड़े हुए पढ़ना चाहिए, इस प्रकार वह सम्वत्सर के दिन और
रातों को लगातार कर देता है। वर्ष के दिन और रात बिना अन्तर के ही गुजरते हैं। इस प्रकार
वह द्वेषी शत्रु को अवसर नहीं देता। यदि बीच में तोड़कर पढ़ेगा तो अपने शत्रु को अवकाश दे
देगा। इसलिए वह बिना तोड़े हुए लगातार पढ़ता है ॥१६॥
अध्याय ४-ब्राह्मण १
मंत्र बोलने से पहले 'हिङ्' बोलना चाहिए। ऐसा कहते हैं कि बिना सामगान के यज्ञ
नहीं होता और साम बिना हिङ्कार के गाया नहीं जाता। हिङ्कार से हिङ् का रूप होता है और
प्रणव या ओङ्कार से साम का रूप। 'ओ३म्' कहने से समस्त यज्ञ सामरूप हो जाता है ॥१॥
हिङ्कार क्यों कहता है? इसलिए कि प्राण हिङ्कार है। प्राण हिङ्कार इसलिए है कि नाक
के नथने बन्द करने पर हिङ्कार नहीं बोल सकते। ऋचाओं को वाणी से बोलता है। वाणी और
प्राण का जोड़ा है। हिङ्कार बोलकर सामिधेनियां पढ़ने का तात्पर्य यह है कि सामिधेनियों में
सन्तान का प्रजनन करा देता है (जोड़ा मिलाकर) ॥२॥
हिङ्कार मन्द स्वर में बोला जाता है। हिङ्कार उच्च स्वर से बोलेगा तो हिङ्कार और
वाणी एक ही हो जाएगी। अतः हिङ्कार को मन्द स्वर से बोलना चाहिए ॥३॥
'आ' और 'प्र' कहकर बोलता है। इस प्रकार वह उधर जानेवाली गायत्री को इधर
आनेवाली गायत्री से जोड़ देता है। उधर जानेवाली गायत्री देवों के लिए यज्ञ को ले जाती है।
इधर आनेबाली गायत्री मनुष्यों की रक्षा करती है। इसलिए 'आ' और 'प्र' का प्रयोग करता
है ॥४॥