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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

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कां० १, अ० ३, ब्रा० ४, कं० १-१० शतपथब्राह्मण / ६१
से परिधियाँ लेनी चाहिएँ ॥२०॥
अध्याय ३-ब्राह्मण ४
वे हरी होनी चाहिएँ । यही हरापन उनका जीवन है। इसी से उनमें शक्ति रहती है।
इसीलिए हरी होनी चाहिएँ ॥१॥
बीच की परिधि के पहले (अग्नि के पश्चिम की ओर) यह मंत्र (यजु० २।३) पढ़कर
रखता है—"गन्धर्व विश्वावसु तुझको विश्व के कल्याण के लिए रक्खे । तू यजमान की परिधि
(रक्षक) है। तू पूज्य अग्नि है" ॥२॥
दक्षिण की परिधि को यह पढ़कर रखता है—"तू इन्द्र की दाहिनी भुजा है, विश्व की
शान्ति के लिए। तू यजमान की परिधि (रक्षक) है। तू पूज्य अग्नि है" ॥३॥
अब उत्तर की ओर परिधि को यह पढ़कर रखता है—"मित्र और वरुण देवता तुझको
उत्तर की ओर रक्खें, ध्रुव नियम से विश्व के कल्याण के लिए। तू यजमान की परिधि है। तू
अग्नि है। ये परिधियाँ अग्नि ही हैं।" इसीलिये कहता है कि 'तुम पूज्य अग्नि हो' ॥४॥
अब एक समिधा रखता है। पहले वह समिधा से बीच की परिधि को छूता है। इस
प्रकार वह तीन परिधियों को जलाता है। फिर वह उस समिधा को आग पर रख देता है। इससे
वह प्रत्यक्ष अग्नि को जलाता है ॥५॥
वह इसको गायत्री छन्द से (यजु० २।४) रखता है—"हे कवि अग्नि, तुझ देवों को बुलाने
वाले, प्रकाश-स्वरूप को हम जलाते हैं, यज्ञ में बलवान् तुझको।" इस प्रकार वह गायत्री को
जलाता है। गायत्री जलकर दूसरे छन्दों को जला देती है और दूसरे छन्द जलकर यज्ञ को देवों
तक ले जाते हैं ॥६॥
अब वह दूसरी समिधा रखता है। उससे वह वसन्त को प्रज्वलित करता है। वह प्रज्वलित
वसन्त दूसरी ऋतुओं को प्रज्वलित करता है। प्रज्वलित ऋतुएँ सन्तान को उत्पन्न करती हैं,
ओषधियों को पकाती हैं। वह इस मन्त्र (यजु० २।५) को पढ़कर रखता है—"तू समित् ।" वस्तुतः
वसन्त समित् है ॥७॥
अब उसको रखकर जपता है—"सूर्य तेरी पूर्व की ओर से रक्षा करे और अन्य बुराई से
भी।" परिधियाँ चारों ओर से रक्षा के लिए होती हैं। इस प्रकार वह पूर्व में सूर्य को रक्षक बना
देता है कि कहीं पूर्व से दुष्ट राक्षस विघ्न न करें। सूर्य दुष्ट राक्षसों को मारनेवाला है ॥८॥
यह जो तीसरी समिधा को अनुयाज के पीछे रखता है, उससे वह ब्राह्मण को प्रज्वलित
करता है। प्रज्वलित होकर ब्राह्मण देवों तक हवि ले जाता है ॥९॥
अब वह कुशों से ढकी हुई वेदी तक लौटता है। दो तृणों को लेकर टेढ़ा रख देता है,
इस मन्त्र (यजु० २।५) से—"तुम सविता की भुजाएँ हो।" प्रस्तर स्तूप या चोटी है। वह इन
दोनों को भौंहों के समान तिरछा रख देता है। इसीलिये भौंहें टेढ़ी होती हैं। प्रस्तर क्षत्रिय है