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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

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का० १, अ० ३, ब्रा० २, क० ६-१५ शतपथब्राह्मण / ५३
की हो जाती हैं ॥६॥
जो आज्य लिये जाते हैं वे ऋतुओं और छन्दों के लिए लिये जाते हैं। इनको बिना नाम
लिये लेता है। जुहू में चार बार आज्य लिया जाता है, उपभृत् में आठ बार ॥७॥
जुहू में जो चार बार लेता है वह ऋतुओं के लिए लेता है, प्रयाजों के लिए लेता है। प्रयाज
ही ऋतु हैं। वह आज्य को लेने में किसी का नाम नहीं लेता; अजामिता के लिए। यदि कहे कि
'वसन्त के लिए लेता हूँ या ग्रीष्म के लिए लेता हूँ' तो जामिता आ जाय, इसलिए बिना नाम लिये
ही आज्य को लेता है ॥८॥
आठ बार उपभृत् से जो लेता है वह छन्दों के लिए, अनुयाजों के लिए। अनुयाज छन्द
हैं। इनको बिना नाम लिये ही लेता है, अजामिता के लिए। यदि कहे कि 'गायत्री के लिए या
त्रिष्टुभ के लिए' तो जामिता आ जाय, इसलिए इसको आज्य के रूप में ही बिना देवता का नाम
लिये ही लेता है ॥९॥
ध्रुवा में जो चार बार लेता है वह समस्त यज्ञ के लिए। इसको भी वह आज्य के रूप में
बिना देवता का नाम लिए ही लेता है। नाम किस देवता का लिया जाय ? वह तो सभी देवताओं
के लिए निकालता है। इसलिए बिना नाम लिये ही आज्य के रूप में उसको लेता है ॥१०॥
यजमान जुहू के पीछे खड़ा होता है और जो उसका अशुभचिन्तक है वह उपभृत् के
पीछे। खानेवाला जुहू के पीछे खड़ा होता है और खाई जानेवाली चीज उपभृत् के पीछे। जुहू
खानेवाला है और उपभृत् खाद्य। जुहू में चार बार लेता है और उपभृत् में आठ बार ॥११॥
जुहू में चार बार लेता है, इसलिए कि खानेवाला परिमित और छोटा हो जाय। उपभृत्
में आठ बार लेता है कि खाद्य पदार्थ अपरिमित और बहुत हो जाय। जहाँ खानेवाला छोटा हो
और खाद्य पदार्थ बहुत हो, वहाँ यह समृद्धि का सूचक है ॥१२॥
जुहू में चार बार में बहुत आज्य ले लेता है और उपभृत् में आठ बार में कम आज्य लेता
है ॥१३॥
जुहू में जो चार बार लेता है और अधिक लेता है, इससे वह खानेवाले को छोटा और
परिमित बनाकर उसमें अधिक वीर्य (बल) दे देता है। उपभृत् में जो आठ बार में थोड़ा आज्य
लेता है उससे खाद्य को अपरिमित और बहुत बना देता है, और उसको शक्तिहीन तथा निर्बल
बना देता है। जैसे राजा एक एक ही स्थान से बैठा-बैठा बहुत-सी प्रजा को वश में करके उन पर
मन-चाहा राज करता है, इसी प्रकार अध्वर्यु जुहू में बहुत-सा घृत ले लेता है। जो जुहू में लेता
है उसकी भी जुहू से आहुति देता है, और जो उपभृत् में लेता है उसकी भी जुहू से ही आहुति
देता है ॥१४॥
इस पर शंका करते हैं कि जब उपभृत् से आहुति नहीं देना तो उपभृत् में लेना क्यों ?