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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

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कां० १, अ० ३, ब्रा० २, क० १-६ शतपथब्राह्मण / ५१
पवित्रों से, सूर्य्य की रश्मियों से तुझे पवित्र करता हूँ।' शेष स्पष्ट है ॥२३॥
अब आज्य में लिपटे हुए पवित्रों से प्रोक्षणी पात्रों को पवित्र करता है, उसी मन्त्र
(यजु० १।३१) से—"सविता की प्रेरणा से, छिद्ररहित पवित्रों से, सूर्य्य की रश्मियों से, तुझे
पवित्र करता हूँ" ॥२४॥
आज्य में लिपटे हुए पवित्रों से प्रोक्षणी को पवित्र करने का अर्थ यह है कि जल में दूध
रख दिया। जल में दूध हितकर होता है। जब बरसता है तो ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं।
ओषधियों को खाकर और जल को पीकर ही रस बनता है। ऐसा करने से वह यजमान को रस-
युक्त और पूर्ण कर देता है ॥२५॥
अब अध्वर्यु आज्य को देखता है। कुछ लोगों का मत है कि यजमान को देखना चाहिए।
इस पर याज्ञवल्क्य कहते हैं कि यजमान स्वयं ही अध्वर्यु क्यों नहीं बन जाते ? स्वयं ही आशीर्वाद
के मन्त्र क्यों नहीं पढ़ लेते ? इनमें इनको श्रद्धा कैसे हो जाती है ? यज्ञ में ऋत्विज लोग जो भी
कृत्य करते हैं वह सब यजमान के लिए ही तो होता है। अतः अध्वर्यु को ही देखना चाहिए ॥२६॥
वह इसका अवलोकन करता है। सत्य चक्षु है। सत्य चक्षु ही है, क्योंकि यदि किसी
विषय में विवाद उपस्थित हो जाय और एक कहे 'मैंने देखा है', दूसरा कहे 'मैंने सुना है', तो देखे
हुए की बात पर श्रद्धा की जाती है। इस प्रकार वह सत्य से इसकी वृद्धि करता है ॥२७॥
वह यजु० १।३१ से उसका अवलोकन करता है—"तू तेज है, तू शुक्र है, तू अमृत है।"
यह मन्त्र ठीक तो है। क्योंकि आज्य तेज है, अमृत है। इस प्रकार वह इसकी सत्य से अभिवृद्धि
करता है ॥२८॥
अध्याय ३—ब्राह्मण २
यज्ञ पुरुष है। यज्ञ पुरुष क्यों है ? इसलिए कि पुरुष ही यज्ञ को तानता है; और जब
तन जाता है तो यज्ञ इतना बड़ा हो जाता है जितना पुरुष १ ॥१॥
यज्ञ की यह भुजा (दाहिनी) जुहू है और यह भुजा (बाईं) उपभृत् है। ध्रुवा धड़ है।
धड़ से ही सब अंग उपजते हैं। इसलिए ध्रुवा से ही सब यज्ञ उत्पन्न होता है ॥२॥
स्रुवा प्राण है। प्राण सब अंगों में जाता है। इसलिए स्रुवा, सब स्रुचों (चमचियों) में
जाता है ॥३॥
जुहू द्यौ लोक है, उपभृत् अन्तरिक्ष और ध्रुवा पृथिवी। पृथिवी से ही सब लोक उपजते
हैं। इसी प्रकार ध्रुवा में ही सब यज्ञ उत्पन्न होता है ॥४॥
स्रुवा बहनेवाला वायु है। वायु का संचार सब लोकों में होता है। इसीलिए स्रुवा सब
स्रुचों तक जाता है ॥५॥
जब यज्ञ ताना जाता है तो देवों के लिए, ऋतुओं के लिए और छन्दों के लिए। हवि,
सोमराजा और पुरोडाश देवों के लिए होती है। वह जब इनको लेता है तो उन-उन देवताओं का
नाम लेकर कहता है 'मैं अमुक देवता के लिए तुझ प्रिय को लेता हूँ'। इस प्रकार वह उस देवता
१. यज्ञ पुरुष की कृति है। कृति कर्त्ता के अनुरूप होती है।