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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

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Page 687

कां० ४, अ० ६, ब्रा० ७, कं० ११-२० शतपथब्राह्मण / ६६६
इस सदस् में नर-साम नारी-ऋक् की कामना करता है। इनके मैथुन से इन्द्र उत्पन्न
होता है। तेज ही तेज उत्पन्न हुआ। ऋक् और साम से इन्द्र हुआ क्योंकि इन्द्र उसी को कहते
हैं जो तपता है (सूर्य) ॥११॥
इस हविर्धान में नर-सोम नारी-जल (संस्कृत में 'आप' स्त्रीलिंग है। अर्बी और हीब्रू
में भी जल के वाचक स्त्रीलिंग मिलते हैं) की कामना करता है। इसके मैथुन से चाँद उत्पन्न
होता है। यह जो जल और सोम के मैथुन से चाँद उत्पन्न हुआ, मानो अन्न से अन्न उत्पन्न
हुआ, क्योंकि चन्द्रमा उसका अन्न है जो तपता है (सूर्य का)। इस प्रकार वह यजमान को
उत्पन्न करता है, और उसके लिए अन्न को उत्पन्न करता है। ऋक् और साम से वह यजमान
को उत्पन्न करता है और सोम-जल से वह उसके लिए अन्न उत्पन्न करता है ॥१२॥
देवों ने पहले यजुः से यज्ञ किया, फिर ऋक् से, फिर साम से। इसीलिए ये भी पहले यजुः
से यज्ञ करते हैं, फिर ऋक् से, फिर साम से, क्योंकि वे कहते हैं कि 'यज' ही 'यजुः' है ॥१३॥
जब देवों ने इन विद्याओं से अपनी कामनाओं को दुहा तो सबसे अधिक यजुः से दुहा।
इस प्रकार यह खाली-सा हो गया। यह उन दो विद्याओं के बराबर न रहा, अन्तरिक्ष दोनों
लोकों के बराबर न था ॥१४॥
देवों ने चाहा कि यह विद्या उन दो विद्याओं के बराबर कैसे हो? यह अन्तरिक्ष उन
दो लोकों के बराबर कैसे हो ? ॥१५॥
उन्होंने कहा, 'धीमी आवाज से यजुः से यज्ञ करें, तब यह विद्या उन दो विद्याओं के
बराबर हो जायगी। तब अन्तरिक्ष इन दो लोकों के बराबर हो जायगा' ॥१६॥
उनके धीमी आवाज से यज्ञ करने से यजुओं की शक्ति बढ़ गई। यह विद्या दूसरी दो
विद्याओं के बराबर हो गई। इस प्रकार अन्तरिक्षलोक अन्य दो लोकों के तुल्य हो गया। इसलिए
यजुः निरुक्त (स्पष्ट) होते हुए भी अनिरुक्त है, इसलिए अन्तरिक्ष निरुक्त होते हुए भी अनि-
रुक्त है ॥१७॥
जो यजुओं को धीमी आवाज से पढ़ता है वह यजुओं को शक्तिशाली करता है और ये
शक्तिशाली होकर उसको शक्तिशाली करते हैं। जो यजुओं को उच्चस्वर से पढ़ता है वह उनको
निर्बल बनाता है और वे निर्बल होकर उसको निर्बल कर देते हैं ॥१८॥
ऋक् और साम वाणी हैं। मन ही यजुः है। जो ऋक् और साम से यज्ञ करते हैं वे
वाणी हैं और जो यजुः से यज्ञ करते हैं वे मन हैं। इसलिए बिना अध्वर्यु की आज्ञा के कुछ काम
नहीं किया जाता। जब अध्वर्यु कहता है 'अनुवाक् कहो, यज्ञ करो' तब वे यज्ञ करते हैं जो ऋक्
से यज्ञ करते हैं। जब अध्वर्यु कहता है कि 'सोम पवित्र हो गया, लौटो' तो वे यज्ञ करते हैं जो
साम से यज्ञ करते हैं। मन के द्वारा विचारे बिना तो वाणी कुछ कहती नहीं ॥१९॥
इस प्रकार मनरूपी अध्वर्यु आगे-आगे चलता है। इसीलिए पुरश्चरण नाम पड़ा। जो