शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)
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Read in contextकां० ४, अ० ६, ब्रा० ३-४, कं० १-३ व १-५ शतपथब्राह्मण / ६६१
पहले पशु का आलभन करे- एक वरुण के लिए, फिर एक अग्नि के लिए। इस प्रकार ग्यारह
पशुओं से यज्ञ करे ॥१॥
या प्रतिदिन इन्द्र-अग्नि के लिए एक-एक पशु का आलभन करे। अग्नि ही सब देवता
हैं। अग्नि में ही सब देवताओं के लिए आहुति दी जाती है। इन्द्र यज्ञ का देवता है। इस प्रकार
न तो वह किसी देवता को अप्रसन्न करता है, न उसको जो यज्ञ का देवता है ॥२॥
स्तोम-अयन का नियम यह है। अग्निष्टोम में अग्नि के पशु का आलभन करे। अग्निष्टोम
में अग्नि के लिए आलभन करना उचित ही है। यदि उक्थ्य यज्ञ हो तो दूसरे पशु को इन्द्र और
अग्नि के लिए, क्योंकि उक्थ्य इन्द्र और अग्नि के हैं। यदि षोडशी हो तो तीसरा पशु इन्द्र के लिए
होना चाहिए, क्योंकि इन्द्र षोडशी है। यदि अतिरात्र हो तो सरस्वती के लिए एक पशु हो, क्यों-
कि सरस्वती वाणी है। वाणी स्त्री है और रात्रि भी स्त्री है। इस प्रकार यज्ञ-ऋतुओं की अलग-
अलग-पहचान है। ये तीन अयन या यज्ञ की रीतियाँ हैं। जैसा चाहे वैसा करे। दो पशुओं का
आलभन अवश्य करे। दूसरे पशु का सूर्य के लिए विषुवत् के दिन और प्रजापति के लिए महाव्रत
के दिन ॥३॥
महाव्रतीयः
अध्याय ६-ब्राह्मण ४
अब महाव्रतीय ग्रह के विषय में यह बात है कि जब प्रजापति ने प्रजा को सृजा तो उसके
शरीर के जोड़ थक गये और थके हुए जोड़ों से वह अपने को उठा न सका। तब देव अर्चना तथा
श्रम करते रहे। तब उन्होंने इस महाव्रतीय ग्रह को देखा। उसको उन्होंने इस (प्रजापति) के
लिए लिया और उससे इसके जोड़ स्वस्थ हो गये ॥१॥
उन स्वस्थ जोड़ों से वह उस अन्न को प्राप्त हुआ जो कुछ कि प्रजापति का अन्न है,
क्योंकि जो मनुष्यों का खाना है वही देवों का व्रत है। चूंकि यह महान् व्रत था जिससे वह स्वस्थ
हो गया, इसलिए इसका नाम 'महाव्रतीय' पड़ा ॥२॥
जो सालभर के यज्ञ में बैठते हैं वे उसी प्रकार के हो जाते हैं, जैसा प्रजापति हो गया था
जब वह प्रजा बनाने बैठा। जिस प्रकार प्रजापति वर्षभर के पश्चात् अन्न को प्राप्त हुआ, इस
प्रकार ये भी वर्षभर के पश्चात् अन्न को प्राप्त होते हैं। और जो इन रहस्यों को समझते हैं
उन्हीं के लिए वे इस (महाव्रतीय) ग्रह को निकालते हैं ॥३॥
इसको इन्द्र विमृध के लिए निकालना चाहिए। जो वर्षभर के यज्ञ में बैठते हैं उनके साथ
'मृध' अर्थात् शत्रु या हँसी करनेवाले मर जाते हैं और वे सबको जीत लेते हैं, इसलिए 'इन्द्र विमृध'
के लिए इस मन्त्र से, “वि.न ऽ इन्द्र मृधो जहि नीचा यच्छ पृतन्यतः। यो ऽ अस्माँ२ ऽ अभिदा-
सत्यधरं गमया तमः। उपयामगृहीतोऽसीन्द्राय त्वा विमृध ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वा विमृधे"
(यजु० ८।४४, ऋ० १०।१५२।४) — "हे इन्द्र, हमारे शत्रुओं का नाश कर। उनको जो हमसे
लड़ते हैं नीचा कर। जो हमारे ऊपर आक्षेप करते हैं, उनसे घोर निकृष्ट अन्धकार को प्राप्त
करा। हे ग्रह ! तू आश्रय के लिए लिया गया है। तुझे इन्द्र मृध के लिए। यह तेरी योनि है।
तुझे विमृध इन्द्र के लिए" ॥४॥
या विश्वकर्मा के लिए। जो सालभर के यज्ञ में बैठते हैं उनका सब काम पूर्ण हो जाता