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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

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Page 675

का० ४, अ० ५-६, ब्रा० १०-१, कं० ७-८ व १-६ शतपथब्राह्मण / ६५७
दक्षिणा की गायें लाने से पहले कलश टूट जाय तो एक गाय दान दे और अवभृथ स्नान के पीछे
फिर दीक्षित होवे, क्योंकि यह दूसरा यज्ञ ही इसका प्रायश्चित्त है। इतना उन लोगों के लिए
जिनसे कलश टूट जाय ॥७॥
अब उन लोगों के विषय में जिनसे सोम कुछ शेष रह जाय। यदि अग्निष्टोम के पीछे
कुछ सोम शेष रह जाय तो पूतभृथ में से उक्थ्य ग्रह को भर ले। यदि उक्थ्य भरने पर भी शेष
रहे तो षोडशी करे। यदि षोडशी पर भी बच रहे तो अतिरात्र यज्ञ करे। यदि अतिरात्र से भी
बच रहे तो दिन का यज्ञ (बृहत्साम या महाव्रत) करे। इसके पीछे तो अवश्य ही कुछ न
बचेगा ॥८॥
अंशुग्रहः
अध्याय ६--ब्राह्मण १
यह जो अंशु ग्रह है वह प्रजापति ही है। यह इस यज्ञ का आत्मा है, क्योंकि प्रजापति
आत्मा है। 'इस प्रकार जब वे इस ग्रह को निकालते हैं तो मानो यज्ञ के आत्मा को बनाते हैं।
इसमें प्राणों को स्थापित करता है, जैसे इन प्राणों अर्थात् ग्रहों की व्याख्या होती है। यजमान
अपने सम्पूर्ण शरीरसहित परलोक में जन्म लेता है ॥१॥
जब इस ग्रह को ग्रहण करते हैं तो यह आरम्भण है। जब नहीं ग्रहण करते तो आरम्भण
नहीं है। इसलिए अंशु ग्रह को ग्रहण करता है ॥२॥
वह उदुम्बर लकड़ी का होता है। यह प्रजापति है। उदुम्बर प्रजापति का है। इसलिए
उदुम्बर लकड़ी का पात्र होता है ॥३॥
यह चौकोर पात्र होता है। लोक तीन हैं। तीन कोनों से तीन लोकों की प्राप्ति होती
है। इन तीन लोकों के अतिरिक्त चौथा प्रजापति है। इस प्रकार चौथे कोने से प्रजापति की
प्राप्ति करता है। इसलिए चौकोर पात्र होता है ॥४॥
सिल-बटने (ग्रावाण) को चुपके से लेता है। चुपके ही सोम अंशु को उस पर रखता
है। चुपके से उस पर पानी छोड़ता है। चुपके से बटना उठाकर उसे एक बार पीसता है। चुपके
से बिना सांस लिये आहुति देता है। इस प्रकार यजमान को प्रजापति बना देता है ॥५॥
इसमें एक सोने का टुकड़ा रक्खा होता है। उसको सूंघता है। यदि कहीं खुजलाये या
घाव हो जाय तो सोना अमृत है। इस प्रकार अपने में अमृत को धारण करता है ॥६॥
राम औपतस्विनि का कहना है कि जितना जी चाहे सांस ले। चुपके से आहुति देने-मात्र
से ही यजमान प्रजापति बन जाता है ॥७॥
उसमें सोने का टुकड़ा होता है। उसको सूंघता है। यदि खुजलाये या घाव हो जाय तो
सोना अमृत है। इसलिए इसमें अमृत या दीर्घ जीवन की स्थापना करता है ॥८॥
बुडिल आश्वतराश्वि का कहना है कि केवल बटने को उठाकर इसको ले लेवे, पीसे न।