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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 661 of 699

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Page 661

कां० ४, अ० ५, ब्रा० ५, कं० १-१२ शतपथब्राह्मण / ६४३
अध्याय ५-ब्राह्मण ५
यह जो यज्ञ किया जाता है यही प्रजापति है जिससे प्रजाएँ उत्पन्न हुई हैं या अब तक
उत्पन्न होती हैं ॥१॥
उपांशु पात्र के पीछे बकरियां लाई जाती हैं। इस उपांशु पात्र का प्रयोग यज्ञ में पुनः-पुनः
होता है। इसलिए ये प्रजा भी फिर-फिर लाई जाती हैं ॥२॥
अन्तर्याम पात्र के पीछे भेड़ें लाई जाती हैं। इस अन्तर्याम पात्र का प्रयोग यज्ञ में पुनः-
पुनः होता है। इसलिए ये प्रजा भी फिर-फिर लाई जाती हैं ॥३॥
अब चूंकि इन दोनों पात्रों के होते हुए उपांशु की आहुति पहले दी जाती है, इसी प्रकार
बकरियों और भेड़ों के साथ होते हुए बकरियाँ आगे चलती हैं, भेड़ें पीछे ॥४॥
अब चूंकि उपांशु की आहुति देकर उसको ऊपर से पोंछते हैं, इसलिए जिस प्रकार तेज
(गाड़ी के) आरे ऊपर को चलते हैं इसी प्रकार ये बकरियाँ भी बड़ी तेजी से चढ़ जाती हैं ॥५॥
और चूंकि अन्तर्याम की आहुति देकर उसको नीचे से पोंछते हैं, इसलिए भेड़ें नीचे को
सिर करके चलती हैं मानो खोद रही हैं। ये बकरियाँ और भेड़ें प्रजापति के सबके प्रत्यक्ष नमूने
हैं। इसलिए वर्ष में तीन बार बच्चा देती हैं और दो या तीन बच्चे देती हैं ॥६॥
शुक्र पात्र के पीछे मनुष्य लाये जाते हैं। चूंकि इस पात्र का यज्ञ में पुनः-पुनः प्रयोग
होता है, इसलिए प्रजा भी पुनः-पुनः लाई जाती हैं। शुक्र वही है जो तपता है (अर्थात् सूर्य);
यही इन्द्र है। मनुष्य पशुओं में इन्द्र है। इसलिए यह उनके ऊपर राज्य करता है ॥७॥
ऋतु-पात्र के पीछे एक खुरवाले (पशु) लाये जाते हैं। चूंकि यज्ञ में इस पात्र का प्रयोग
फिर-फिर होता है, इसलिए ये प्रजा भी फिर-फिर लाई जाती हैं। ऋतु-पात्र ऐसा होता है (हाथ
से बताकर) और एक खुरवाले पशुओं का सिर भी ऐसा होता है। आग्रयण पात्र, उक्थ्य पात्र
और आदित्य पात्र—इन पात्रों के पीछे गायें लाई जाती हैं। इन सबका यज्ञ में पुनः-पुनः प्रयोग
होता है, इसलिए प्रजायें बार-बार लाई जाती हैं ॥८॥
चूंकि बकरियाँ कनिष्ठ पात्रों के पीछे लाई जाती हैं, इसलिए ये साल में तीन बार बच्चा
देती हैं और दो या तीन बच्चे होते हैं, और कनिष्ठ होते हैं, क्योंकि ये कनिष्ठ पात्रों के पीछे लाई
जाती हैं ॥९॥
और गायें चूंकि भूयिष्ठ (पुष्कल) पात्रों के पीछे लाई जाती हैं, इसलिए साल में एक
बार एक ही बच्चा देकर भी वे पुष्कल होती हैं, क्योंकि भूयिष्ठ पात्रों के पीछे लाई जाती
हैं ॥१०॥
अब द्रोण कलश में अन्त को हारियोजन ग्रह निकालता है। द्रोण कलश प्रजापति है।
यह इन्हीं प्रजाओं का रूप हो जाता है। इनकी रक्षा करता है। इनको सूंघता है। यह इनको
उत्पन्न करता है अर्थात् इन्हीं का-सा रूप हो जाता है ॥११॥
ये पात्र पाँच हैं जिनके अनुसार प्रजायें लाई जाती हैं—उपांशु और अन्तर्याम (मिलकर)