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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 653 of 699

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Page 653

का० ४, अ० ५, ब्रा० २, क० १०-१७ शतपथब्राह्मण / ६३५
'यस्य' के स्थान में 'यस्यै' और 'तं' के स्थान में 'तां' कह दे अर्थात् "अंगान्यह्रुता यस्यै तां मात्रा
समजीगम॒ स्वाहा" (यजु० ८।२६) । "यदि गर्भ में (नर-मादा का भेद) ज्ञात न हो सके तो
नर मानकर ही कार्य करे क्योंकि 'गर्भ' पुंल्लिग है अर्थात् "अंगान्यह्रुता यस्य तं मात्रा समजी-
गम॒ स्वाहा" (यजु० ८।२६)। पहले इसको इसकी माता से अलग किया था जब इसे माँ के
गर्भ से निकाला था। अब इसको मंत्र-पाठ के द्वारा पूर्ण करके इसकी माँ से मिला देता है ॥१०॥
अब अध्वर्यु वनस्पति के लिए आहुति देता है। अध्वर्यु वनस्पति के लिए आहुति देने के
पश्चात् उपभृत् में जो भाग हैं उनको मिलाकर कहता है, 'अग्नि स्विष्टकृत् के लिए अनुवाक
पढ़।' अब प्रतिप्रस्थाता आता है और सम्पूर्ण मेध को लाता है। उसके ऊपर दो बार घी छोड़ता
है। श्रौषट् कहलवाकर अध्वर्यु कहता है 'प्रेष्य' अर्थात् आरम्भ करो। वषट्कार के पीछे अध्वर्यु
आहुति देता है। अध्वर्यु के पीछे प्रतिप्रस्थाता होम करता है—॥११॥
इस मंत्र से—"पुरुदस्मो विषरूप ऽ इन्दुः" (यजु० ८।३०)—'पुरुदस्म' का अर्थ है बहु-
दान (बहुत दान करनेवाला); विषरूप का अर्थ है बहुरूप वाला, क्योंकि गर्भ कई रूपों के
होते हैं। "इन्दुरन्तर्महिमानमानञ्ज धीरः" (यजु० ८।३०)—"मेधावी रस ने अपने भीतर
महत्ता को धारण किया।" वस्तुतः यह गर्भ माता में स्थित हुआ। "एकपदीं द्विपदीं त्रिपदीं
चतुष्पदीमष्टापदीं भुवनानु प्रथन्ताँ स्वाहा" (यजु० ८।३०)—'एक पैर वाली, दो पैर वाली,
तीन पैर वाली, चार पैर वाली, आठ पैर वाली में ये भुवन प्रसरित हों।" यह गाय की बड़ाई
है। अष्टापदी न होने के स्थान में यदि अष्टापदी से आहुति दी जाय तो अधिक फल होगा॥१२॥
इस पर कुछ लोग पूछते हैं कि गर्भ का क्या किया जाय ? उसको वृक्ष पर फैला दें। गर्भ
अन्तरिक्ष में स्थित रहते हैं। वृक्ष भी अन्तरिक्ष है, इस प्रकार इसकी इसी से प्रतिष्ठा हो जायगी,
परन्तु इस पर लोग कहते हैं कि यदि कोई गाली दे कि वह 'इसको काटकर वृक्ष पर लटका देंगे'
तो उसी के समान यह भी है ॥१३॥
इसको जल में छोड़ दें। क्योंकि जल तो इस सबकी प्रतिष्ठा है। इस प्रकार जल में
इसकी स्थापना हो जाएगी। परन्तु इस पर भी लोग कहते हैं कि जैसे कोई गाली दे कि 'वह जल
में डूबकर मर जाय' यह भी वैसा ही है ॥१४॥
उसको घूरे में गाड़ दें। यह पृथिवी तो सभी की प्रतिष्ठा है। इस प्रकार वह इसकी
पृथिवी में स्थापना करता है। इस पर भी लोगों का कहना है कि यह भी वैसा ही होगा जैसे कोई
गाली दे कि यह मर गया, इसके लिए श्मशान तैयार है ॥१५॥
पशुश्रपण में इसकी मरुतों के लिए आहुति दे देवे। देवों में मरुत् या साधारण पुरुष तो
आहुति को खाते नहीं। बे-पका गर्भ तो आहुति में गिना नहीं जाता (अहुत है)। पशुश्रपण तो
आहवनीय में से लिया जाता है। इस प्रकार इसका यज्ञ से बहिष्कार नहीं होगा, और न यह
प्रत्यक्ष रूप में आहवनीय में डाला जाता है। मरुत् देवों के ही हैं। इस प्रकार वह इसकी मरुतों में
स्थापना कर देता है ॥१६॥
समिष्ट यजुओं की आहुति के पीछे जब अंगारे कुछ शान्त हो रहे हों तो अंगोछे में गर्भ