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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

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Page 649

कां० ४, अ० ५, ब्रा० १-२, कं० १२-१६ व १-३ शतपथब्राह्मण / ६३१
वर्ष-भर के लिए या अधिक काल के लिए ॥१२॥
अब वह उदवसानीय इष्टि करता है। वह अग्नि के लिए पाँच कपालों का पुरोडाश
बनाता है। उसके याज्य और अनुवाक पाँच पद की पंक्तिवाले होते हैं। इस समय यज्ञ करनेवाले
का यज्ञ थक-सा जाता है, वह उससे विमुख-सा हो जाता है। अग्नि 'सब यज्ञ' है, क्योंकि अग्नि में
ही सब यज्ञ किये जाते हैं चाहे पाक यज्ञ हों या अन्य। वह इसी यज्ञ को फिर लेता है। इस प्रकार
यह यज्ञ थकने नहीं पाता, वह उससे विमुख नहीं होने पाता ॥१३॥
पाँच कपालों का पुरोडाश इसलिए होता है कि याज्य और अनुवाक में पाँच पद की
पंक्तियाँ होती हैं और यज्ञ भी पाँचवाला है। इस प्रकार वह फिर यज्ञ को ही आरम्भ करता है।
इस प्रकार यज्ञ थकता नहीं और इससे विमुख नहीं होता ॥१४॥
उसकी दक्षिणा सोना है। यह यज्ञ अग्नि का है। सोना अग्नि का वीर्य है। इसलिए सोना
दक्षिणा है या बैल, यह ढोने के कारण अग्नि का है। क्योंकि इसका कन्धा ऐसा हो जाता है मानो
अग्नि में जला दिया गया ॥१५॥
अब चार भाग घी लेकर विष्णु की ऋचा द्वारा आहुति देता है, "उरु विष्णो विक्रमस्वोरु
क्षयाय नस्कृधि । घृतं घृतयोने पिब प्रप्र यज्ञपतिं तिर स्वाहा" (यजु० ५।३८)—"हे विष्णु,
चौड़ी टाँगें बढ़ाओ। हमारे लिए खुले मकान बनाओ। हे घृतयोनि, घृत पियो और यज्ञपति की
उन्नति करो।" यज्ञ विष्णु है। इस प्रकार वह यज्ञ को फिर आरम्भ करता है। इस प्रकार यज्ञ
थकता नहीं और वह उससे विमुख नहीं होता। इस समय जितनी शक्ति हो उतनी दक्षिणा दे,
क्योंकि यज्ञ बिना दक्षिणा के नहीं होना चाहिए ऐसा कहते हैं। जब यह उदवसानीय इष्टि समाप्त
हो जाय तो सायंकाल की आहुति देता है। परन्तु प्रातःकाल की आहुति प्रातःकाल ही दी जाती
है ॥१६॥
आनुबन्ध्य-यागः
अध्याय ५—ब्राह्मण २
वे वशा का आलभन करते हैं और उसका आलभन करके उसे मारते हैं। मारने के बाद
कहते हैं 'वपा को निकाल।' जब वपा निकल चुके तो मारनेवाले से कहना चाहिए कि गर्भ को
खोजे (अर्थात् यह देखने का यत्न करे कि गाय कहीं गर्भिणी तो नहीं थी) ।१ यदि गर्भ न मिले
तो अच्छा ही है। यदि मिल जाय तो इसका प्रायश्चित्त करना चाहिए ॥१॥
यह तो ठीक है नहीं कि उसको एक (अकेली गाय) मानकर ही कार्य कर डालें या
उसको दो मानकर (अर्थात् गाय और उसका पेट का बच्चा) ही कार्य करें। तात्पर्य यह है कि
देख-भालकर जाँच कर लेनी चाहिए और उसी के अनुसार बरतना चाहिए। अब कहे कि थाली
और उष्णीष (अँगौछा या कपड़े का छोटा-सा टुकड़ा) लाओ ॥२॥
अब वपा से जैसा नियम है उसी के अनुसार कृत्य करते हैं। वपा के कृत्य के पश्चात्
अध्वर्यु और यजमान दोनों लौट आते हैं। अध्वर्यु कहता है कि 'गर्भ को निकाल।' क्योंकि बिना
कहे तो कोई गर्भ को निकालता नहीं, जब तक कि माता रोगी न हो या मर न गई हो। या जब
गर्भ पूरा हो जाता है तो जनने के समय स्वयं ही बाहर निकल आता है। उससे कहना चाहे कि
१. गो-हत्या के ये बीभत्स कर्मकाण्ड सर्वथा प्रक्षिप्त हैं। — स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती