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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

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Page 635

कां० ४, अ० ४, ब्रा० ३-४, कं० १०-१५ व १-३ शतपथब्राह्मण / ६१७
वाले के लिए है। परन्तु ऐसा न करना चाहिए, क्योंकि और पान तो चमसों के अनुसार होते हैं
और यह अतिरिक्त है। इसलिए इसमें सबका भाग शामिल है। इसलिए धानों को सोम-पान के
लिए बाँट लेते हैं ॥१०॥
उनको दाँत से न चबाना चाहिए। ये पशु हैं। कहीं ऐसा न हो कि पशुओं को हानि
पहुंचे। केवल प्राणों के द्वारा पीते हैं, इस मन्त्र से- "यस्ते ऽ अश्वसनिर्भक्षो यो गोसनिः" (यजु०
८।१२) - "जो तेरा पान घोड़ों का दाता और गौओं का दाता है।" यह पशु है। इसलिए कहा
यह घोड़ों का दाता है, गौओं का दाता है। "त ऽ इष्टयजुष स्तुतस्तोमस्य" (यजु० ८।१२) -
"यजु से आहुति दी गई और स्तोमों से स्तुति की गई।" क्योंकि यजुओं से आहुति दी गई और
स्तोमों से स्तुति की गई। "शस्तोक्थस्य ।" (यजु० ८।१२) - क्योंकि उक्थ्य कहे गये।
"उपहूतस्योपहूतो भक्षयामि" (यजु० ८।१२) - "बुलाया हुआ मैं बुलाये हुए को पीता हूँ।"
क्योंकि निमन्त्रित निमन्त्रित को पीता है ॥११॥
उनको आग में न डालना चाहिए। ऐसा न हो कि अग्नि में उच्छिष्ट (जूठा) वस्तु पड़
जाय। उनको उत्तर वेदी में रख देते हैं। इस प्रकार ये यज्ञ से बहिष्कृत नहीं होते ॥१२॥
अब वे भरे हुए पात्रों को छूते हैं जिनको कुछ लोग 'अप्पु षोमा' (जलों में सोम) कहते
हैं। जैसे जुता हुआ घोड़ा ले जाता है इसी प्रकार ये भी ऋत्विज का काम करते हैं। परन्तु
जुते हुए घोड़े के घाव हो जाता है या वह खुजलाता है। जल शान्ति और ओषधि है। यहाँ यज्ञ
में भी जब कभी घाव हो जाय या खुजलावें तो जल शान्तिदायक होने के कारण जलों से ही
शान्ति लेते हैं; जलों को ही धारण करते हैं इसलिए वे भरे हुए पात्रों को छूते हैं ॥१३॥
वे इस मन्त्र से छूते हैं "सं वर्चसा पयसा सं तनूभिरगन्महि मनसा सं॒ शिवेन । त्वष्टा
सुदत्रो विदधातु रायोऽनुमार्ष्टु तन्वो यद् विलिष्टम्" (यजु० ८।१४) - "तेज, रस और शरीरों
से तथा कल्याणकारी मन से हम मिलें। अच्छा दानी त्वष्टा हमको धन दे और हमारे शरीर
में जो घाव (त्रुटियाँ) हों उनको चंगा कर दे।" इस प्रकार जो घाव है उसको चंगा करता
है ॥१४॥
अब वे अपने मुंह को छूते हैं। दो कारण हैं जिनसे मुख को छूते हैं। जल अमृत है। अमृत
से ही वे छूते हैं। इसके अतिरिक्त वे इस कर्म (यज्ञ) को अपने में धारण करते हैं। इसलिए
मुखों को छूते हैं ॥१५॥
समिष्टयजुर्होमः
अध्याय ४-ब्राह्मण ४
इस अवसर पर वह नौ समिष्ट यजुओं से आहुति देता है। नौ समिष्ट यजुओं से आहुति
देने का तात्पर्य यह है कि ये बहिष्पवमाने स्तोत्र नौ होते हैं। इस प्रकार दोनों ओर विराट्
न्यून रहता है उत्पत्ति के लिए (विराट् में १० अक्षर चाहिएँ)। इसी दो ओर की न्यूनता से
प्रजापति ने प्रजा को उत्पन्न किया। एक से ऊर्ध्व (ऊपर को चढ़ानेवाले) और दूसरे से नीचे
जानेवाले ॥१॥
स्तोत्रों में हिङ्कार दसवाँ है। इन समिष्ट-यजुओं में स्वाहा दसवाँ है। इस प्रकार यह
न्यून विराट् रसवाला हो जाता है ॥२॥
समिष्ट-यजु नाम इसलिए पड़ा कि इस यज्ञ से जिस देवता को बुलाते हैं या जिन देवताओं