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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

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Page 633

कां० ४, अ० ४, ब्रा० २-३, कं० १८ व १-१० शतपथब्राह्मण / ६१५
मिला देता है इस मन्त्र को पढ़कर “प्र॒जाप॑तिवृँ'षासि रेतो॒धा रेतो॒ मयि॑ धेहि” (यजु० ८।१०)–
“तू प्रजापति नर है, वीर्य को रखनेवाला। मुझे वीर्य दे।” प्रजापति उद्गाता है और पत्नी स्त्री
है। इस प्रकार जोड़े से उत्पत्ति होती है ॥१८॥
हारियोजनग्रहः
अध्याय ४—ब्राह्मण ३
छन्द देवों के पशु (वाहक या बैल) हैं। जैसे बैल जुतकर मनुष्यों का सामान ले जाते हैं,
ऐसे ही छन्द जुतकर देवों के लिए यज्ञ को ले जाते हैं। जब-जब छन्दों ने देवों की तृप्ति की, तब-
तब देवों ने छन्दों की तृप्ति की। जुते हुए छन्द देवों के लिए यज्ञ को ले गये, उससे पहले उन्होंने
उनको तृप्त किया ॥१॥
अब हारियोजन ग्रह को लेता है। हारियोजन छन्द है। इस प्रकार वह छन्दों को तृप्त
करता है, इसीलिए हारियोजन ग्रह लिया जाता है ॥२॥
इसको अतिरिक्त-ग्रह (दूसरों ग्रहों से अतिरिक्त) की भाँति लेता है। इसे उस समय
लेता है जब होता 'शम्य' कहता है। देव हैं और अतिरिक्त छन्द भी है। मनुष्य हैं और अति-
रिक्त पशु भी हैं। इसलिए अतिरिक्त ग्रह को लेता है ॥३॥
इसको द्रोणकलश में लेता है। सोम वृत्र था। उसको जब देवों ने मारा, उसका सिर
फट गया और वह द्रोणकलश हो गया। उसमें जितना-जितना रस बहा वह अतिरिक्त था, इसी
प्रकार यह ग्रह भी अतिरिक्त है। इस प्रकार अतिरिक्त में अतिरिक्त को रखता है, इसलिए द्रोण-
कलश में लेता है ॥४॥
इसको बिना पुरोरुक् के लेता है क्योंकि वह इसको छन्दों के लिए लेता है। चूँकि इसको
वह छन्दों के लिए लेता है इसलिए वह पुरोरुक् का काम देता है, अर्थात् पुरोरुक् के रस को लेता
है ॥५॥
इसको इसमें से (आग्रायण ग्रह में से) इस मन्त्र से लेता है, “उप॒यामगृ॑हीतोऽसि॒ हर॑रसि
हा॑रियोज॒नो ह॒रिभ्यांᳵ त्वा” (यजु० ७।११)—“तुझे आश्रय के लिए लिया गया है, तू हरि है।
हरि से युक्त है। दोनों हरियों के लिए तुझको।” दो हरियों से तात्पर्य है ऋक् और सोम का,
अर्थात् ऋक् और साम द्वारा इसको लेता है ॥६॥
अब धान बोता है—“हर्योर्धाना स्थ सहसोमा ऽ इन्द्राय” (यजु० ७।११)—“तुम हरियों
के धान हो। इन्द्र के लिए सोम के साथ।” मित (नपे हुए) या अमित (न नपे हुए) जितने छन्द
हैं वे सब (सोम को) पीते हैं ॥७॥
इस आहुति के लिए उन्नेता श्रौषट् बोलता है। उन्नेता अतिरिक्त है। इस प्रकार
किसी अन्य आहुति के लिए श्रौषट् नहीं कहता। यह आहुति भी अतिरिक्त है। इस प्रकार अति-
रिक्त में अतिरिक्त को रखता है। इसलिए उन्नेता श्रौषट् बोलता है ॥८॥
(द्रोण कलश को) सिर पर रखकर श्रौषट् बोलता है। क्योंकि यह (सोम का) सिर
है। पहले वह (मैत्रावरुण से) कहता है कि 'सोमों के लिए धान के साथ अनुवाक पढ़ो।' श्रौषट्
कहकर बोलता है कि लाये हुए धान-सोमों की आहुति दे। वषट्कार करके आहुति देता है
और अनुवषट्कार करके आहुति देता है। अब सोमपान के लिए धानों को बाँट देते हैं ॥६॥
कुछ लोग द्रोण कलश को होता के पास ले जाते हैं क्योंकि यह सोमपान वषट्कार करने-