शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)
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Read in contextकां० ४, अ० ४, ब्रा० १, कं० ७-१५ शतपथब्राह्मण / ६०७
होता है। सविता इसका प्राण है। प्राण चलायमान होता है। अब वह मैत्रावरुण से कहता है
'सविता देव के लिए अनुवाक कहो।' श्रौषट् कहकर कहता है कि 'देव सविता के लिए आहुति
दे।' वषट्कार आहुति देता है। अनुवषट्कार नहीं करता। सविता इसका मन है। ऐसा न हो
कि मन अग्नि के अर्पण हो जाय। सविता इसका प्राण है। ऐसा न हो कि प्राण अग्नि के अर्पण
हो जाय ॥७॥
अब बिना जूठा किये (अभक्षित) पात्र से वैश्वदेव ग्रह को लेता है। वैश्वदेव ग्रह को
अभक्षित पात्र से इसलिए निकालता है कि सावित्र ग्रह का अनुवषट्कार तो होता नहीं। इसी से
वैश्वदेव ग्रह निकालता है। इस प्रकार वैश्वदेव ग्रह के द्वारा ही उसका भी अनुवषट्कार हो
जाता है ॥८॥
वैश्वदेव ग्रह इसलिए भी निकाला जाता है—सविता इस (यज्ञ) का मन है, विश्वेदेव
ये सब-कुछ हैं, इस प्रकार वह इस सबको मन के आधीन कर देता है। इसीलिए यह सब-कुछ
मन के आधीन होता है ॥६॥
वैश्वदेव ग्रह को इसलिए भी लेता है कि सविता इस यज्ञ का प्राण है। विश्वेदेव ये सब-
कुछ हैं। इस सब में इस प्रकार प्राण और उदान को धारण कराता है। इसलिए इस सब में प्राण
और उदान स्थित हैं ॥१०॥
वैश्वदेव ग्रह को इसलिए भी लेता है कि तीसरा सवन विश्वेदेवों का है। यह साम के
हिसाब से भी 'वैश्वदेव' है, ऋक् के हिसाब से भी और यजुः के पुरश्चरण के हिसाब से भी, जब
कि महावैश्वदेव ग्रह निकाला जाता है ॥११॥
इस ग्रह को पूतभृत में से निकालते हैं। पूतभृत वैश्वदेवों का है, क्योंकि इसी से देवों के
लिए भी निकालते हैं, इसी से मनुष्यों के लिए भी और इसी से पितरों के लिए भी। इसलिए
वैश्वदेव ग्रह को पूतभृत से निकालते हैं ॥१२॥
इसको बिना पुरोरुच् के निकालता है। इसको विश्वदेवों के लिए निकालता है। विश्व-
देवा का अर्थ है 'सब'। अर्थात् जो कुछ ऋक् है, जो यजुः है, जो साम है। चूंकि वह इसको सब
देवों के लिए निकालता है इसलिए वह इसके लिए पुरोरुच्-सम्पन्न हो जाता है। इसलिए उसको
बिना पुरोरुच् के निकालता है ॥१३॥
उसको इस प्रकार निकालता है, "उपयामगृहीतोऽसि सुशर्मासि सुप्रतिष्ठानः" (यजु०
८।८)—"तू आश्रय के लिए लिया गया है। तू सुरक्षित और सुप्रतिष्ठित है।" प्राण ही सुशर्मा
और सुप्रतिष्ठान है। "बृहदुक्षाय नमः" (यजु० ८।८)—'बृहदुक्ष' का अर्थ है प्रजापति, तात्पर्य
यह है कि "प्रजापति के लिए नमः।" "विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्य ऽ एष ते योनिर्विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्यः"
(यजु० ८।८)—"सब देवों के लिए तुझे। यह तेरा स्थान है, सब देवों के लिए तुझे।" यह कह-
कर उसे रख देता है क्योंकि इसको यह विश्वेदेवों के लिए लेता है। अब वह (सदस् में) जाता है
और (होता के सामने) पूर्वाभिमुख बैठता है ॥१४॥
"एकया च दशभिश्च स्वभूते द्वाभ्यामिष्टये विꣳशती च। तिसृभिश्च वहसे त्रिꣳशता