शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)
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Read in contextकां० ४, अ० ३-४, ब्रा० ५-१, क० २३-२४ व १-७ शतपथब्राह्मण / ६०५
ग्रह का है। आदित्य ग्रह का अनुवषट्कार तो होता नहीं। इसी आदित्य ग्रह से तो सावित्र ग्रह
को निकालेंगे। इस प्रकार सावित्र ग्रह के द्वारा इसका भी अनुवषट्कार हो जायगा ॥२३॥
प्रतिप्रस्थाता उन शेष भागों को इसलिए भी पकड़ता है कि इस मिश्रण कृत्य के पहले,
तीसरे सवन से पहले (आदित्यों के लिए) ग्रह दिया जा चुका है। यह ग्रह तीसरे सवन के लिए
है। इस प्रकार आदित्य इस सवन में भी भाग ले लेते हैं और यज्ञ से निकाले नहीं जाते। इस-
लिए प्रतिप्रस्थाता उन शेष भागों को लेता है ॥२४॥
सावित्रग्रहः
अध्याय ४—ब्राह्मण १
सविता इस (यज्ञ) का मन है। इसलिए सावित्र ग्रहों को लेता है। सविता इसका प्राण
भी है। जब उपांशु ग्रह को लेता है तो प्राण को आगे रख लेता है, और जब सावित्र ग्रहों को
लेता है तो प्राण को पीछे रख लेता है। इस प्रकार वे दोनों प्राण हितकर हो जाते हैं, वह जो
ऊपर है और वह जो नीचे ॥१॥
यज्ञ ऋतुएँ या संवत्सर है। प्रातःसवन में तो ऋतुएँ प्रत्यक्ष रीति से मनाई जाती हैं
क्योंकि ऋतु-ग्रहों को निकाला जाता है। दोपहर के सवन में परोक्ष रीति से, क्योंकि दोनों ऋतु-
पात्रों में मरुत्वती ग्रहों को निकाला जाता है। यहाँ न तो ऋतुओं के लिए कोई ग्रह निकाला जाता
है और न ऋतु-पात्रों में ही किसी ग्रह को निकालते हैं ॥२॥
यह जो तपता है वही तो सविता है। यही सब ऋतुएँ हैं। इस प्रकार ऋतुएँ या संवत्सर
तीसरे सवन में प्रत्यक्ष रूप से मनाये जाते हैं। इसलिए सावित्र ग्रह को लेता है ॥३॥
उसको उपांशु पात्र में लेता है। इसका मन सविता है और प्राण उपांशुपात्र । इसलिए
उपांशुपात्र से लेता है, या अन्तर्याम पात्र से। क्योंकि ये तो समान ही है। उपांशु और अन्तर्याम
प्राण और उदान हैं ॥४॥
आग्रयण में से लेता है। इसका मन सविता हैं और आत्मा आग्रयण। इस मन को आत्मा
में ही रखता है; इसका प्राण सविता है, और आत्मा आग्रयण। इस प्रकार आत्मा में ही प्राण को
रखता है ॥५॥
इस मन्त्र से लेता है, "वाममद्य सवितर्वाममु श्वो दिवे दिवे। वाममस्मभ्यं॒ सावीः।
वामस्य हि क्षयस्य देव भूरेरया धिया वामभाजः स्याम॥ उपयामगृहीतोऽसि सावित्रोऽसि
चनोधाश्चनोधा ऽ असि चनो मयि धेहि। जिन्व यज्ञं जिन्व यज्ञपतिं भगाय" (यजु० ८।६-७; ऋ०
६।७१।६)—"हे सविता ! आज और कल, प्रतिदिन हमारे लिए उत्तम फल की प्रेरणा कर। हे
देव ! बहुत बड़े सुखवाले निवास को हम इस बुद्धि से पावें।"—"तुझे आश्रय के लिए लिया गया
है। तू सावित्र ग्रह है। तू आनन्द देनेवाला है। मुझे आनन्द दे। यज्ञ को तृप्त कर। यज्ञपति को
तृप्त कर। भाग्य के लिए" ॥६॥
उसको लेकर भूमि पर नहीं रखता। सविता इस यज्ञ का मन है। यह मन चलायमान