शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)
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Read in contextकां० ४, अ० ३, ब्रा० ४, क० १४-२१ शतपथब्राह्मण / ५९५
रहती हैं। वह शाला के आगे खड़े होकर उनको सम्बोधन करता है, "रूपेण वो रूपमभ्यागाम्"
(यजु० ७।४५) — "तुम्हारे रूप से मुझे रूप मिला।" पहले-पहल पशु दान में दान दिये जाने के
लिए राजी नहीं हुए। वे अपने रूपों को अलग रखकर केवल (नंगे) शरीरों के द्वारा खड़े हो
गये। देव यज्ञ से उन पशुओं के अपने रूपों को ले गए। उन्होंने अपने इन रूपों को पहचाना
और दान के लिए राजी हो गये। यह यजमान भी इसी प्रकार यज्ञ के सामने से पशुओं के निज
रूपों को ले जाता है और वे अपने रूपों को पहचानकर दान में दिये जाने के लिए राजी हो जाते
हैं ॥१४॥
"तुथो वो विश्ववेदा विभजतु" (यजु० ७।४५) — "सबको जाननेवाला तुथ (ब्राह्मण)
तुमको बाँटे।" 'तुथ' है ब्राह्मण। इस प्रकार वह ब्राह्मण के द्वारा बँटवाता है। ब्राह्मण जानता
है कि कौन दक्षिणा के योग्य है, कौन नहीं। इस प्रकार ये गायें भी उसी को दी जाती हैं जो
दक्षिणा के योग्य है। उसको नहीं जो दक्षिणा के योग्य न हो ॥१५॥
"ऋतस्य पथा प्रेत" (यजु० ७।४५) — "ऋत के मार्ग से चलो।" जो देवों के मार्ग से
चलता है वह ऋत के मार्ग से चलता है। "चन्द्र (चन्द्र = स्वर्ण) दक्षिणावाली।" ये गायें यजमान
के दिये स्वर्ण की ज्योति से चलती हैं ॥१६॥
अब वह सदस् में जाता है, "वि स्वः पश्य व्यन्तरिक्षं" (यजु० ७।४५) — "स्वर्ग और
अन्तरिक्ष को देख।" अर्थात् तुझ दक्षिणा के द्वारा मैं स्वर्ग को प्राप्त करूँ — यह उसका उद्देश्य
है ॥१७॥
अब सदस् को देखता है, "यतस्व सदस्यैः" (यजु० ७।४५) — "सदस्यों के साथ यत्न
कर।" अर्थात् 'सदस्य तुझसे आगे न बढ़ जाय' ऐसा कहता है ॥१८॥
अब सोने को लेकर आग्नीध्र (अग्निशाला) के पास जाता है, "ब्राह्मणमद्य विदेयं
पितुमन्तं पैतृमत्यम्" (यजु० ७।४६) — "आज मैं पिता और पितामह वाले ब्राह्मण को प्राप्त
करूँ।" जो अच्छे कुल का ब्राह्मण है उसी का नाम पितुमान और पैतृमत्य है। ऐसे घोड़ों को भी
दक्षिणा देता है; उसको बहुत बड़ी विजय प्राप्त होती है। "ऋषिमार्षेयम्" (यजु० ७।४६) —
"जो वेद पढ़ा हुआ है वह ऋषि और आर्षे है।" "सुधातु दक्षिणम्" (यजु० ७।४६) — "अच्छी
दक्षिणावाला।" क्योंकि इसको अच्छी दक्षिणा दी गई है ॥१९॥
अब अग्नीध् के समीप (आदरपूर्वक) बैठकर (उपसद्य) उसे स्वर्ण देता है। "अस्मद्राता
देवत्रा गच्छत" (यजु० ७।४६) — "हमारे द्वारा दिया हुआ तू देवलोक को जावे।" जो
दक्षिणा उदार मन से बिना संकोच के दी जाती है उसका फल बड़ा होता है। 'देवलोक को
जावे' का तात्पर्य यह है कि मेरे लिए देवलोक में स्थान कर दे। जो कोई यज्ञ करता है इस
आश्रय से करता है कि देवलोक को पाऊँ। इस प्रकार वह इसके लिए देवलोक में स्थान कर देता
है। "प्रदातारमाविशत" (यजु० ७।४६) — "दाता में प्रवेश करो।" अर्थात् मुझमें प्रवेश करो।
इस प्रकार उन गायों से वह वंचित नहीं होता। अग्नीध् को दक्षिणा पहले दिये जाने का तात्पर्य
यह है कि देवों ने इसी के द्वारा अमृतत्व को पाया था। इसलिए अग्नीध् को दक्षिणा पहले देता
है ॥२०॥
अब इसी प्रकार जाकर आत्रेय (अत्रि-वंशज एक पुरुष) को स्वर्ण देता है। पहले एक
बार जब वह प्रातरनुवाक को बोल रहे थे तो सामने स्तोत्र भी कह रहे थे। ऋषियों का होता