शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)
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Read in contextकां० १, अ० २, ब्रा० ५, कं० १८-२४ शतपथब्राह्मण / ४३
(वेदी को पूर्व से पश्चिम की ओर अग्नीध्र ) लीप देता है। जब देव संग्राम की तैयारी
कर रहे थे तो वे बोले- "इस पृथिवी का जो कुछ भाग यज्ञ के योग्य हो उसे चन्द्रलोक को ले चलें।
यदि असुरों ने जीतकर हमको भगा दिया तो हम अर्चना और परिश्रम द्वारा फिर वैभव प्राप्त
कर सकेंगे। इसने भी पृथिवी का जो पवित्र यज्ञ के योग्य भाग था उसको चन्द्रलोक के अर्पण कर
दिया। चांद के काले धब्बे यही हैं। इसीलिये कहावत है कि चन्द्रलोक में इस पृथिवी का यज्ञ-स्थान
है। देवयज्ञ इसी पृथिवी पर उसी वेदी के स्थान में किया जाता है। अतः वह वेदी को लीपता
है ॥१८॥
यजुर्वेद (१।२८) के इस अंश को पढ़कर लीपता है— "हे शक्तिमान् ! इधर-उधर गति
करते हुए क्रूर के पहले।" क्रूर नाम है संग्राम का। संग्राम में बहुत क्रूरता की जाती है। इसमें
बहुत-से मनुष्य, अश्व आदि मरकर धराशायी हो जाते हैं। वे संग्राम से पहले ही पृथिवी के यज्ञ
वाले भाग को चन्द्रलोक को ले गये थे, इसीलिये कहा, 'हे शक्तिशालीन् ! इधर-उधर हिलते हुए
क्रूर से पूर्व।' फिर कहता है— "जीवन देनेवाली भूमि को उठाकर।" इस पृथिवी पर जो जीवन
था उसको उठाकर ही चन्द्रलोक को ले गये थे। इसीलिये कहा, 'जीवन देनेवाली भूमि को उठा-
कर', 'जिसको स्वधाओं के साथ चन्द्रलोक को ले गये', अर्थात् प्रार्थनाओं (ब्रह्म) के साथ।
'बुद्धिमान् लोग अब भी इसी भूमि का अनुदेश करके यज्ञ करते हैं'; अपने यज्ञ को वे इसी भूमि
पर करते हैं। जो इस रहस्य को समझता है उसका यज्ञ भी यहीं होता है ॥१९॥
अब वह (अध्वर्यु) (अग्नीध्र से) कहता है (यजु० १।२८)-"प्रोक्षणी पात्र को (वेदी
में) रक्खो।" स्फ्यारूपी वज्र ने और ब्राह्मण ने अब तक यज्ञ की रक्षा की। जल भी तो वज्र है।
अब इस वज्र को रक्षा के लिए रखता है। प्रोक्षणी को स्फ्या पर रखते समय पहले वह स्फ्या को
उठा लेता है। यदि स्फ्या रक्खी रहे और उस पर प्रोक्षणी रक्खी जाय तो दो वज्र परस्पर टकरा
जायें। ये वज्र न टकराने पावें इसीलिये प्रोक्षणी को स्फ्या पर रखने से पूर्व स्फ्या को उठा लेता
है ॥२०॥
अब इस (पूर्ण) वाणी को बोलता है— "प्रोक्षणी को वेदी में रक्खो। उसी के पास समिधा
और बर्हि भी रक्खो। स्रुक् को माँजो, पत्नी की कमर को कसो और घी लेकर यहाँ आओ।" ये
आदेश (अग्नीध्र के लिए) हैं। अध्वर्यु का जी चाहे तो इसको कहे, जी चाहे न कहे। क्योंकि
अग्नीध्र तो जानता ही है कि क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए ॥२१॥
अब वह स्फ्या को उत्तर की ओर कूड़े पर फेंक देता है। यदि वह किसी शत्रु को मारने
के अभिप्राय से फेंके तो उसको कहना चाहिए कि 'मैं अमुक-अमुक शत्रु के नाश के लिए वज्र
फेंकता हूँ।' यह स्फ्या वज्र के समान ही शत्रु की घातिनी होगी ॥२२॥
अब वह हाथ धोता है। वेदी में जो कुछ क्रूर था उसको फेंक दिया। अतः हाथ धोता
है ॥२३॥
जिन्होंने पहले यज्ञ किया था उन्होंने यज्ञ करते हुए वेदी छली। यह पापकर्म था। जिन्होंने