शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)
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Read in contextकां० १, अ० २, ब्रा० ५, कं० १-६ शतपथब्राह्मण / ३६
को दबाता है। जो ये तीन लोक हैं वही वास्तव में ये यजुः हैं। इसलिए यह इस प्रकार यजुः-
मन्त्र पढ़कर फेंकता है ॥२०॥
चौथी बार चुपचाप। इन लोकों से परे कोई चौथा लोक है नहीं। उस लोक से उस शत्रु
को भगा देता है। यह नहीं निश्चित कि इन तीन लोकों से आगे कोई चौथा लोक है या नहीं।
और जो मौन होकर किया जाय वह भी अनिश्चित ही है। इसलिए वह चौथी बार मौन होकर
फेंकता है ॥२१॥
अध्याय २—ब्राह्मण ५
प्रजापति की दो सन्तान देव और असुर अपने महत्त्व के लिए लड़ पड़े। देव हार गये।
असुरों ने सोचा, 'अब तो यह जगत् हमारा ही हो गया' ॥१॥
उस पर उन्होंने कहा—"अच्छा, इस पृथिवी को परस्पर बाँट लें और उस पर बस
जायें।" अब उन्होंने उसको बैल के चमड़े से पश्चिम से पूर्व तक बाँटा ॥२॥
देवों ने सुना और कहा—"अरे, असुर तो पृथिवी को वास्तव में बाँट रहे हैं। चलो, वहाँ
चलें जहाँ बाँट हो रहा है। यदि हमको कोई भाग न मिला तो हम क्या करेंगे?" विष्णु अर्थात्
इस यज्ञ को अपना नेता बनाकर वे वहाँ गये ॥३॥
उन्होंने कहा—"अपने साथ हमको भी कुछ बाँट दो। हमारा कुछ तो भाग हो!" असुरों
ने संकोच करते हुए कहा—"अच्छा हम तुमको केवल इतना भाग देते हैं जितने में यह विष्णु लेट
सके" ॥४॥
विष्णु तो वामन था। परन्तु देवों को भय नहीं हुआ। उन्होंने कहा—"इस यज्ञ-भर को
यदि स्थान मिल गया तो बहुत मिल गया" ॥५॥
उन्होंने उस विष्णु या यज्ञ को पूर्व की ओर लिटाकर तीन ओर से छन्दों से घेर दिया
(यजु० १।२७)—दक्षिण की ओर 'गायत्री छन्द से तुझे घेरता हूँ', पश्चिम की ओर 'त्रिष्टुभ् छन्द
से तुझे घेरता हूँ', उत्तर की ओर 'जगती छन्द से तुझे घेरता हूँ' ॥६॥
इस प्रकार तीन ओर छन्दों से घेरकर, पूर्व की ओर अग्नि को रखकर देव अर्चना और
श्रम करते रहे। इस प्रकार होते-होते समस्त पृथिवी ले ली। सब पृथ्वी ले ली, इसलिए इसका
नाम वेदी पड़ा। इसीलिए कहते हैं कि जितनी वेदी उतनी पृथिवी, क्योंकि इसी वेदी के द्वारा
उन्होंने पृथिवी जीत ली। जो इस रहस्य को समझता है वह इसी प्रकार समस्त पृथिवी को अपने
शत्रुओं से छीन लेता है और उनको उसमें भाग नहीं देता ॥७॥
अब विष्णु थक गया। तीनों ओर से छन्दों द्वारा ढका हुआ था और पूर्व की ओर अग्नि
था। अतः वहाँ से भाग न सकता था। इसलिए वह ओषधियों की जड़ों में छिप गया ॥८॥
देव कहने लगे—"विष्णु कहाँ गया ? यज्ञ कहाँ गया ? वह तो छन्दों द्वारा तीनों ओर
और पूर्व की ओर अग्नि द्वारा घिरा हुआ था। भाग तो सकता नहीं। उसको यहीं खोजना
चाहिए।" कुछ खोदा ही था कि वह मिल गया। केवल तीन अंगुल नीचे। इसलिए वेदी को तीन