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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 563 of 699

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Page 563

कां० ४, अ० १, ब्रा० ४-५, कं० ८-१० व १-७ शतपथब्राह्मण / ५४५
अमित्र नहीं होना चाहता।' 'तो हम तुझे यज्ञ से निकाल देंगे।' तब उसने कहा 'अच्छा, मैं भी
मारूँगा।' तब पशु उसके पास से चले गये कि यह मित्र था, अमित्र हो गया। तब वह पशुओं से
वंचित रह गया। सोम में दूध मिलाने से देवों ने उसको पशुओं से युक्त कर दिया। इसी प्रकार
यह भी सोम में दूध मिलाकर इस यजमान या मित्र को पशुओं से युक्त कर देता है ॥८॥
इस पर कुछ लोग कहते हैं कि उसने तो मारना नहीं चाहा था। इसलिए इसमें जितना
दूध है वह मित्र का है और जितना सोम है वह वरुण का। इसलिए सोम में दूध मिलाता है ॥६॥
वह इस मन्त्र से मिलाता है—“राया वयँ॒ ससवाꣳ॑सो मदेम हव्येन देवा यवसेन गावः ।
तां धेनुं मित्रावरुणा युवं नो विश्वाहा धत्तमपस्फुरन्तीमेष ते योनिर्ऋतायुभ्यां त्वा” (यजु०
७।१०, ऋक् ४।४२।१०)—“जो सम्पत्ति हमको मिली है उससे हम आनन्दित हों। देव हव्य से
और गायें घास से। हे मित्र-वरुण, तुम हमको यह सदा दूध देनेवाली गाय दो।” यह कहकर वह
उस ग्रह को रख देता है—“यह तेरी योनि है। ऋत और आयु के लिए तुझको।” 'ऋत और आयु
के लिए' क्यों कहा ? अह्म ऋत है। अह्म मित्र है। वरुण आयु है। संवत्सर वरुण है, संवत्सर
आयु है। इसलिए कहा कि 'यह तेरी योनि है, ऋत और आयु के लिए तुझको' ॥१०॥
आश्विनग्रहः
अध्याय १—ब्राह्मण ५
आश्विन ग्रह इसका श्रोत्र हैं। इसलिए चारों ओर घुमाकर पीता है। इस श्रोत्र से चारों
ओर की बात सुनता है। जब अङ्गिरा-वंशी भृगु लोग स्वर्ग को गये, च्यवन भार्गव या च्यवन
आंगिरस जीर्ण और आकृति-मात्र पीछे छूट गया ॥१॥
उसी समय मनुवंशी शर्याति अपने स्वजनों के साथ उधर आया और वहीं बस गया।
उसके कुमारों ने खेलते हुए इस जीर्ण भयानक पुरुष को देखा और उसको अनर्थ्य या नाचीज
समझकर उस पर ढेले मारने लगे ॥२॥
उसने शर्याति वालों पर क्रोध किया और उनमें उसने विद्रोह उत्पन्न कर दिया। बाप
बेटे से और भाई भाई से लड़ने लगा ॥३॥
शर्याति ने सोचा कि मैंने कुछ किया है जिससे ऐसी आपत्ति आई है। उसने ग्वालों और
गडरियों को बुलाकर कहा—॥४॥
उसने कहा, 'अरे तुमने आज कोई नई बात देखी है?' उन्होंने उत्तर दिया कि 'एक
जीर्ण और दीन पुरुष लेटा हुआ है, उसको नाचीज समझकर कुमारों ने उस पर ढेले फेंके थे।'
वह समझ गया कि यह च्यवन है ॥५॥
उसने रथ जोतकर उसमें अपनी सुकन्या नामक लड़की को बिठाया और वहाँ आया
जहाँ वह ऋषि था ॥६॥
और कहा, 'ऋषि, नमस्ते ! मैंने जाना नहीं इसलिए आपको दुःख दिया। यह सुकन्या है.