शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)
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Read in contextकां० ४, अ० १, ब्रा० ३-४, कं० १६ व १-८ शतपथब्राह्मण / ५४३
भिरागतम् । इन्दवो वामुशन्ति हि । उपयामगृहीतोऽसि वायव ऽ इन्द्र वायुभ्यां'' (यजु० ७।८,
ऋ० १।२।४)—"हे इन्द्र-वायु, यह सोम है। आप दोनों इसके पान के लिए आइये। बूंदें आपको
चाहती हैं। तू उपयाम के साथ लिया गया है। इन्द्र और वायु के लिए तू है।" अब वह यह
कहकर रखता है कि 'यह तेरी योनि है। तुझको ही मिले हुओं के साथ लेता हूँ।' जो वायु है वह
इन्द्र है; जो इन्द्र है सो वायु है, इसलिए कहा, 'यह तेरी योनि है।' दोनों मिले हुओं के साथ
तुझको लेता हूँ' ॥१६॥
मैत्रावरुणग्रहः
अध्याय १—ब्राह्मण ४
मित्र और वरुण इसके ऋतु और दक्ष हैं। यह इनका अध्यात्म है, अर्थात् ऋतु और दक्ष
आत्मिक वृत्तियाँ हैं। जब वह मन में सोचता है कि 'मेरा ऐसा हो जाय, मैं यह करूँ' यही ऋतु
अर्थात् मित्र है। और जब उसकी इच्छा पूरी हो जाती है तो यह दक्ष हुआ। मित्र ऋतु है और
वरुण दक्ष। ब्रह्म मित्र हैं, क्षात्र वरुण । ब्राह्मण सोचता है और क्षत्रिय करता है ।।१।।
आरम्भ में ये ब्राह्मण और क्षत्रिय अलग-अलग थे। तब मित्र अर्थात् ब्राह्मण वरुण
अर्थात् क्षत्रिय बिना रह सकता था ॥२॥
लेकिन वरुण या क्षत्रिय मित्र अर्थात् ब्राह्मण के बिना नहीं रह सकता था। वरुण जो
कुछ कर्म मित्र या ब्राह्मण की प्रेरणा के बिना करता उसी में असफलता हो जाती ।।३।।
वह क्षत्रिय वरुण ब्राह्मण मित्र के पास आया और कहा, 'तू मेरी ओर आ कि हम दोनों
मिल जायें। तुझी को आगे रक्खूँ। तेरी प्रेरणा से काम करूं।' उसने कहा, 'अच्छा।' वे दोनों
मिल गये। इसीलिए यह मित्र और वरुण का ग्रह हुआ ॥४॥
यही पुरोहित है। इसलिए ब्राह्मण को चाहिए कि (बिना पता लगाये) हर किसी
क्षत्रिय का पुरोहित न बने जिससे पुण्य और पाप मिल न जावें, और क्षत्रिय को चाहिए कि
(बिना पता लगाये) हर ब्राह्मण को अपना पुरोहित न बना ले कि पाप और पुण्य मिल न जायँ।
वरुण ने मित्र ब्राह्मण की प्रेरणा से जो कर्म किये उनमें उसकी सफलता हुई ॥५॥
यदि ब्राह्मण राजा के बिना रहे तो कोई दोष नहीं है। यदि राजा हो तो इसमें दोनों का
भला है। परन्तु क्षत्रिय को बिना ब्राह्मण के नहीं रहना चाहिए। क्षत्रिय जो कुछ कर्म बिना
मित्र ब्राह्मण की प्रेरणा के करता है उसमें उसकी सफलता नहीं होती। इसलिए क्षत्रिय जो कुछ
करना चाहे उसमें वह ब्राह्मण के पास जाय, क्योंकि जो कुछ वह ब्राह्मण की प्रेरणा से करेगा
उसमें उसे सफलता होगी ॥६॥
अब वह इसको इस मन्त्र से लेता है— "अयं वां मित्रावरुणा सुतः सोम ऽ ऋतावृधा ।
ममेदिह श्रुतं ु हवम् । उपयामगृहीतोऽसि मित्रावरुणाभ्यां त्वा" (यजु० ७।६, ऋ० २।४१।४) -
"हे पवित्र मित्र और वरुण, यह सोम तुम दोनों के लिए निचोड़ा गया। मेरे निमन्त्रण को
सुनो। तुमको उठाया गया है मित्र वरुण के लिए" ॥७॥
उसमें दूध मिलाता है। दूध इसलिए मिलाता है। सोम ही वृत्र था। जब देवों ने उसे
मारा तो उन्होंने मित्र से कहा, 'तू भी मार।' उसने न माना- 'मैं सबका मित्र हूँ। मित्र होकर