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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 555 of 699

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Page 555

का० ४, अ० १, ब्रा० २, क० १८-२६ शतपथब्राह्मण / ५३७ -
अगर वह उपांशु को रक्खे तो इस अर्थात् अन्तर्याम को भी रक्खे । यदि उपांशु को न
रक्खे तो इसको भी न रक्खे । यदि उपांशु को (हाथ से) ढके तो इस अन्तर्याम को भी ढके । वह
उपांशु को न ढके तो इस अन्तर्याम को भी न ढके । जैसा उपांशु के लिए, वैसा इसके लिए, क्योंकि
उपांशु और अन्तर्याम दोनों एक ही हैं । वे प्राण और उदान हैं ॥१८॥
चरक लोग इन आहुतियों को दो और मन्त्रों से देते हैं । उनका कहना है कि दोनों यज्ञ
के प्राण और उदान हैं। हम इन दोनों को भिन्न-भिन्न पराक्रमवाले बनाते हैं। परन्तु ऐसा न
करना चाहिए। इससे यजमान के प्राण और उदान बिगड़ जाते हैं। इस आहुति को चुपचाप भी
दिया जा सकता है ॥१९॥
जिस मन्त्र से उपांशु की आहुति दी जाती है उसी से इसकी भी दी हुई समझ ली जाती
है। फिर इसको चुपचाप कैसे दिया जाय ? क्योंकि उपांशु और अन्तर्याम दोनों एक ही हैं। ये
उसके प्राण और उदान हैं ॥२०॥
वह जिस मन्त्र से उपांशु की आहुति देता है उसी से इस (अन्तर्याम) की भी देता है—
“स्वाङ्कृतोऽसि विश्वेभ्य ऽ इन्द्रियेभ्यो दिव्येभ्यः पार्थिवेभ्यो मनस्त्वाष्टु स्वाहा सुभव सूर्याय”
(यजु० ७।६)—"तू स्वयं-बना हुआ है, सब पार्थिव और दिव्य शक्तियों के लिए । मन तेरा
हो । हे स्वयं होनेवाले ! सूर्य के लिए।" इस मन्त्र का महत्त्व कहा जा चुका ॥२१॥
आहुति देकर ग्रह को नीचे से पोंछ डालता है । उपांशु की आहुति देकर उसने ग्रह को
ऊपर से पोंछा था। इसको नीचे से पोंछता है। इस प्रकार उदान को उसमें निर्धारित करता
है ॥२२॥
अब हथेली को नीचे को करके बीच की परिधि (समिधा) में सोम मलता है । उपांशु
की आहुति देकर उसने हथेली को ऊपर को करके पश्चिम से पूर्व की ओर मध्य समिधा को मला
था । परन्तु अब की बार पूर्व से पश्चिम की ओर हथेली को नीचा करके मलता है, इस मन्त्र से,
“देवेभ्यस्त्वा मरीचिपेभ्यः” (यजु० ७।६)—इसका महत्त्व वही है जो पहले का ॥२३॥
(हविर्धान की ओर) चलकर वह ग्रह को इस मन्त्र से रख देता है, “उदानाय त्वा”
(यजु० ७।६)—यह उसका उदान है। वह इस प्रकार रखता है कि वे एक-दूसरे को छूते हैं। इस
प्रकार वह प्राण और उदान को छुआता है। उन दोनों में संसर्ग उत्पन्न करता है ॥२४॥
ये (उपांशु और सवन) सायंकाल के सवन तक वैसे ही रक्खे रहते हैं जैसे मनुष्य भूमि
पर सोते हैं। इनका सायंकाल के सवन में प्रयोग होता है। जैसे ये मनुष्य सोकर उठते हैं, और
कारबार में लगते हैं। यह यज्ञ के अनुसार है। यज्ञ एक पक्षी है। उपांशु और अन्तर्याम इसके
पक्ष हैं। उपांशु-सवन इसका आत्मा (शरीर) है ॥२५॥
सायंकाल के सवन तक वे वैसे ही रहते हैं। यज्ञ ताना जाता है। जो ताना जाता है उसमें
गति होती है। जैसे पक्षी पंख खोलकर उड़ते हैं, सिकोड़कर नहीं उड़ते । सायंकाल के सवन में
इनका फिर प्रयोग होता है। ये पक्षी अपने पंखों को सिकोड़कर उड़ते हैं जब उड़ान को बन्द