शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)
Page 551 of 699
Read in contextका० ४, अ० १, ब्रा० १-२, कं० २७-२८ व १-८ शतपथब्राह्मण / ५३३
है। परन्तु ऐसा न करना चाहिए। उसको उत्तर की ओर रक्खे। क्योंकि इससे उत्तर (उत्कृष्ट)
कोई ग्रह है ही नहीं। इसको "प्राणाय त्वा" (यजु० ७।३) कहकर रखता है क्योंकि यह उसका
प्राण है ॥२७॥
अब वह उपांशु सवन को लेता है। वह इसको न झालर से छूता है न पवित्रे से। ऐसा
करने से तो पानी से धोने के तुल्य होगा। यदि कोई अंशु या सोमलता का टुकड़ा लगा हो तो
उसे हाथ से छुटा दे और उस (उपांशु सवन) को (उपांशु-ग्रह के) पास रख दे उत्तर की ओर
मुंह करके, इस मन्त्र से—"व्यानाय त्वा" (यजु० ७।३) क्योंकि यह यज्ञ का व्यान है ॥२८॥
अन्तर्यामग्रहः
अध्याय १—ब्राह्मण २
इस (यज्ञ) का प्राण उपांशु ग्रह है, व्यान उपांशु सवन है और अन्तर्याम ग्रह उदान
है ॥१॥
अन्तर्याम नाम यों पड़ा—जो प्राण है सो उदान, वही व्यान है, इसी में उस जाते हुए
प्राण को धारण करता है; जो उपांशु ग्रह को लेता है, और जो अन्तर्याम ग्रह को लेता है उसमें
लौटते हुए उदान को लेता है, यह उदान उसके अन्तरात्मा में ही है; यह जो उदान अन्तरात्मा
में है और चूंकि इसमें यह प्रजा 'यताः' अर्थात् व्याप्त है, इसलिए इस ग्रह का नाम 'अन्तर्याम'
पड़ गया ॥२॥
उसको पवित्रे के भीतर से निकालता है। इस प्रकार लौटके निकलते हुए उदान को
उसमें धारण करता है। यह उदान उसी में स्थित होता है। इसीसे उसकी उपांशु-आहुति पवित्रे
के भीतर से निकली हुई हो जाती है, क्योंकि उपांशु और अन्तर्याम एक ही हैं, क्योंकि वे प्राण
और उदान हैं। इसके अतिरिक्त इसके द्वारा उसका प्राण अन्य ग्रहों में भी निरन्तर स्थित हो
जाता है ॥३॥
सोम को पवित्रे से शुद्ध करने का कारण यह है-जब सोम ने अपने ही पुरोहित बृहस्पति
को सताया था तो पीछे से उसने उसका माल वापस कर दिया था और वह शान्त हो गया था।
माल लौटा देने पर भी कुछ दोष तो शेष रह ही गया क्योंकि उसने ब्राह्मण को सताने का विचार
कर लिया था ॥४॥
उसको देवों ने पवित्रे से शुद्ध किया। वह पवित्र होकर देवों की हवि बन गया। इसी
प्रकार यह भी इसे पवित्रे से शुद्ध करता है। यह पवित्र होकर देवों की हवि बन जाता है ॥५॥
उपयाम के साथ ग्रह इसलिए लिये जाते हैं कि यह पृथिवी आहुति है। आदित्य चरु
इसका प्रायणीय हवि है। वह सोम के बनाने से पूर्व की बात है। उसने चाहा कि देवों के साथ
मेरा भी भाग मिल जाय, और कहा कि निचोड़े हुए सोम में से मुझे भी भाग मिले ॥६॥
उन देवों ने कहा, 'यज्ञ तो देवताओं में बँट चुका। तेरे द्वारा ही ग्रह लिये जायेंगे, और
तेरे ही द्वारा देवताओं की आहुतियां दी जावेंगी।' उसने कहा 'अच्छा।' वस्तुतः यह उस अर्पित
सोम का उस (अदिति) का भाग है ॥७॥
उपयाम के साथ ग्रह इसलिए भी लिये जाते हैं कि यह पृथिवी उपयाम है क्योंकि यह अन्न
आदि को रखती है (उपयच्छति) - पशुओं के लिए, मनुष्यों के लिए और वनस्पतियों के लिए।