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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

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Page 55

कां० १, अ० २, ब्रा० ४, कं० १४-२० शतपथब्राह्मण / ३७
जो यजमान से वैर करता है या उससे द्वेष करता है उसको वह इन तीनों लोकों द्वारा;
या यदि कोई चौथा लोक हो उसके द्वारा भी दबा देता है। इन तीनों अथवा चौथे से भी इसको
निकाल देता है क्योंकि इसी पृथिवी पर तो सब लोक स्थित हैं। यदि वह कहेगा कि मैं अन्तरिक्ष
को फेंक दूं या द्यौ को फेंक दूं तो वह क्या फेंकेगा ? अतः वह पृथिवी से ही सबको फेंक देता है ॥१४॥
अब तृण को बीच में रखकर स्फ्या से प्रहार करता है। बीच में तृण को इसलिए रखता
है कि कहीं वज्र से पृथिवी को हानि न पहुँच जावे ॥१५॥
प्रहार करते समय इस मन्त्रांश (यजु० १।२५) को पढ़ता है- "हे देवयजनि पृथिवि ! मैं
तेरी ओषधियों के मूल को हानि न पहुँचाऊँ।" इस प्रकार वह उसको उत्तर-मूला कर देता है
अर्थात् उसके मूल सुदृढ़ हो जाते हैं। जब वह स्फ्या से खुदी हुई मिट्टी उठाता है तो कहता है, 'मैं
तेरी ओषधियों के मूल को हानि न पहुँचाऊं। तू व्रज अर्थात् गोशाला को जा। दैव (द्यौ) तुझ पर
वर्षा करें।' जब पृथिवी खोदी गई तो खुदाई में पृथिवी को क्षति पहुँची। जल शान्ति है। अतः जल
को वहाँ डालकर उसका उपशमन कर देता है। इसीलिए कहा कि 'दैव तुझ पर वर्षा करें।' (खुदी
हुई मिट्टी को फेंकते समय) कहता है, 'हे देव सविता, तू इससे पृथिवी के परले सिरे से बाँध दे।'
इसका तात्पर्य यह है कि 'गहरे अँधेरे से बाँध', 'सौ फन्दों (पाशों) से', अर्थात् इस प्रकार कि
वह छूटने न पावे। फिर कहता है, 'जो हमसे द्वेष करता है या जिसको हम द्वेष करते हैं उसको
मत छोड़।' चाहे किसी निश्चित की ओर संकेत हो या न हो, उसे कहना चाहिए कि 'अमुक-
अमुक को मत छोड़' ॥१६॥
अब स्फ्या को दोबारा फेंकता है इस मन्त्र (यजु० १।२६) को पढ़कर- 'मैं अररु को इस
यज्ञ की स्थली पृथिवी से दूर कर दूँ।' अररु एक राक्षस था। देवों ने उसे भगा दिया था। इसी
प्रकार अध्वर्यु भी अररु को भगाता है। अब फिर (वह उन-उन कृत्यों को दुहराते हुए) कहता
है, 'तू गायों के स्थान अर्थात् व्रज को जा। दैव तुझ पर वर्षे। सविता देव तुझे पृथिवी के परले सिरे
से बाँधे। जो हमसे द्वेष करता है या जिससे हम द्वेष करते हैं, उसको यहाँ से मत छोड़' ॥१७॥
अग्नीध्र उसको यह मन्त्र (यजु० १।२६) पढ़कर कूड़े पर फेंकता है- "हे अररु ! तू स्वर्ग
को न जा।" जब देवों ने राक्षस अररुको निकाला तो उसने स्वर्ग को जाना चाहा। अग्नि ने उसे
दबा दिया और कहा, 'अररु, तू स्वर्ग को मत जा।' वह स्वर्ग को नहीं गया। इसी प्रकार अध्वर्यु
उसको पृथिवी से छुड़ा देता है और अग्नीध्र स्वर्ग से रोक देता है। यह इसीलिए किया जाता
है ॥१८॥
अब (स्फ्या को) तीसरी बार फेंकता है इस मन्त्रांश (यजु० १।२६) को पढ़कर- "तेरी
बूंदें द्यौलोक को न जावें।" यह बूंद वह रस है जिससे प्रजावें जीती हैं। इसलिए वह कहता है कि
'तेरी बूंदें द्यौलोक को न जावें।' अब कहता है, 'गोशाला या व्रज को जा। दैव तुझ पर वर्षे। हे
सविता देव, तू इसको पृथिवी के परले सिरे से बाँध, सौ फन्दों से। जो हमसे द्वेष करे या हम
जिससे द्वेष करें उसको मत छोड़' ॥१९॥
तीन बार यजुः-मन्त्रों से उसको फेंकता है। लोक तीन हैं। इन तीन लोकों से उस बुराई