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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 547 of 699

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Page 547

कां० ४, अ० १, ब्रा० १, कं० ९-१६ शतपथब्राह्मण / ५२६
उसको पवित्र करता है, इसलिए कहा 'गभस्तिपूतः' ॥९॥
अब वह ग्यारह बार कुचलता है। त्रिष्टुप् में ग्यारह अक्षर होते हैं। त्रिष्टुप् दोपहर का
सवन है। इस प्रकार यह दोपहर का सवन हो जाता है ॥१०॥
वह इस मन्त्र से ग्रहण करता है—"देवो देवेभ्यः पवस्व" (यजु० ७।१)—"देव देवों के
लिए पवित्र हो ।" यह (सोम) देव है और देवों के लिए पवित्र होता है। "येषां भागोऽसि"
(यजु० ७।१)—वस्तुतः यह उनका भाग है ॥११॥
अब बारह बार कुचलता है । जगती बारह अक्षर की होती है। तीसरा सवन जगती का
है । इस प्रकार यह तीसरा सवन हो जाता है ॥१२॥
वह इस मन्त्र के द्वारा ग्रहण करता है—"मधुमतीर्नऽइषस्कृधि" (यजु० ७।२)—
"हमारे अन्नों की मीठा कर ।" इस प्रकार इसमें रस डालता है और देवों के चखने योग्य बनाता
है। इस प्रकार मारा जाकर वह सड़ता नहीं। और जब वह इस ग्रह की आहुति देता है तो
उसकी वहाँ स्थापना करता है ॥१३॥
ब्रह्मवर्चस् की इच्छावाला आठ बार कुचले । गायत्री में आठ अक्षर होते हैं। गायत्री
ब्रह्मवर्चसी है ॥१४॥
इस प्रकार चौबीस चोटों से कुचलना हो जाता है। वर्ष के अर्ध मास चौबीस होते हैं।
संवत्सर प्रजापति हैं, प्रजापति यज्ञ है। वह यज्ञ जितना है और जितनी उसकी मात्रा है उतनी
ही उसकी संस्थापना हो जाती है ॥१५॥
पशु की कामनावाला पाँच बार कुचले । कहते हैं कि पशु पांचवाले हैं। इस प्रकार
पशु की प्राप्ति करता है। संवत्सर में पाँच ऋतुएँ होती हैं। संवत्सर ही प्रजापति है। प्रजापति
यज्ञ है। जितना यह यज्ञ है, जितनी इसकी मात्रा है उतनी ही इसकी संस्थापना है। यह केवल
मीमांसा (कल्पना) है। दूसरी क्रिया इस प्रकार है—॥१६॥
ग्रह को लेकर पोंछता है कि कुछ टपके न। वह इसको रखता नहीं है। यह उसका प्राण
है। इस प्रकार उसका प्राण निरन्तर चलता है। यदि इसको रोकना चाहे तो इसको रख दे
और कहे 'मैं अमुक के तुम प्राण को रोकता हूँ।' चूंकि अध्वर्यु उसको छोड़ता नहीं, अतः वह
(प्राण) उस (शत्रु) में नहीं रहता । इस प्रकार अध्वर्यु और यजमान दीर्घ जीवन को प्राप्त
होते हैं ॥१७॥
या उसको हाथ से दबाकर कहे कि 'मैं अमुक के तुझ प्राण को दबाता हूँ।' चूंकि वह
उसको रखता नहीं, अतः वह (प्राण) शत्रु में नहीं रहता । इस प्रकार वह प्राणों को नष्ट नहीं
करता ॥१८॥
जब वह हविर्धान के भीतर ही होता है तभी 'स्वाहा' कहता है। देवों को डर था कि
होम से पहले जो कुछ इस ग्रह का अंश है उसको असुर राक्षस नष्ट न कर दें। इसलिए जब
वे हविर्धान के भीतर थे तभी उन्होंने स्वाहा कह दिया, और जो कुछ आहुति दी उससे अग्नि
में फिर आहुति दे दी। इस प्रकार यह भी जब हविर्धान के भीतर है तभी स्वाहा करके आहुति
देता है, और जो कुछ आहुति दी जाती है उसी को फिर आग में छोड़ देता है ॥१९॥