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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 545 of 699

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Page 545

का० ४, अ० १, ब्रा० १, कं० १-६ शतपथब्राह्मण / ५२७
चतुर्थ काण्ड
अथ ग्रह नामकं चतुर्थ काण्डम्
उपांशुग्रहः क्षुल्लकाभिषवश्च
अध्याय १—ब्राह्मण १
उपांशु यज्ञ का प्राण है। उपांशु सवन व्यान है और अन्तर्याम ग्रह उदान है ॥१॥
इसको उपांशु क्यों कहते हैं? अंशु नामी ग्रह प्रजापति है। यह ग्रह उसका प्राण है।
चूंकि वह इसका प्राण है इसलिए उपांशु हुआ ॥२॥
इसको पवित्रे के विना लेता है। उससे परांच प्राण (दूर जाते हुए प्राण) को धारण
करता है। उसका यह बाहर की ओर जाता हुआ निकलता है। उसको सोम के अंशु या डालियों
से पवित्र करता है, क्योंकि ये पवित्र होती हैं। छः डालियों से पवित्र करता है। छः ऋतुएँ हैं।
इस प्रकार ऋतुओं से पवित्र करता है ॥३॥
इस पर कुछ लोग कहते हैं कि उपांशु ग्रह को तो सोम की डालियों से पवित्र करते हैं
और अन्य सोम पवित्रे से पवित्र किये जाते हैं, तो ये डालियाँ किससे पवित्र होती हैं ? ॥४॥
उन (डालियों) को इस मन्त्र को पढ़कर (सोम पर) डाल देता है या उपवपन करता
है—“यत् ते सोमादाभ्यं नाम जागृवि तस्मै ते सोम सोमाय स्वाहा” (यजु० ७।२)—“हे सोम,
तेरा जो दमन करने योग्य जगानेवाला नाम है उस तुझ सोम के लिए स्वाहा।” इस स्वाहाकार
से ही ये डालियाँ पवित्र हो जाती हैं। यह ग्रह सब-कुछ है, क्योंकि यह सब सवनों का रूप
है ॥५॥
जब देवों ने यज्ञ ताना तो वे राक्षसों के आक्रमण से भयभीत हो गए। उन्होंने कहा कि
पहले हम यज्ञ की स्थापना कर लें, फिर यदि राक्षस आक्रमण भी करेंगे तो हमारा यज्ञ तो
स्थापित रहेगा ही ॥६॥
उन्होंने प्रातः-सवन में ही सम्पूर्ण यज्ञ स्थापित कर दिया—इसी (उपांशु) ग्रह में यजुः
से, पहले स्तोत्र में साम से, पहले शस्त्र में ऋक् से। इसी पूर्णतया स्थापित यज्ञ के द्वारा उन्होंने
अर्चन किया। यह भी इसी प्रकार यज्ञ को स्थापित करता है,—पहले इसी ग्रह में यजुः से, पहले
स्तोत्र में सोम से, प्रथम शस्त्र में ऋक् से। उसी स्थापित यज्ञ से वह अर्चन करता है ॥७॥
यह सोम आठ बार कुचला जाता है। आठ अक्षर की गायत्री होती है। प्रातः-सवन
गायत्री-सम्बन्धी है। इस प्रकार यह प्रातः-सवन होता है ॥८॥
वह इस मन्त्र से लेता है—“वाचस्पतये पवस्व” (यजु० ७।१)—“वाचस्पति के लिए
पवित्र हो।” वाचस्पति प्राण है। यह ग्रह भी प्राण है। इसलिए कहा कि वाचस्पति के लिए
पवित्र हो। “वृष्णोऽअ॑ंशुभ्यां गभस्तिपूतः” (यजु० ७।१) सोम की दो डालियों से इसे पवित्र
करता है, इसलिए कहा कि “शक्तिशाली के दो अंशुओं से।” ‘गभस्ति’ का अर्थ है हाथ। हाथ से