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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 535 of 699

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Page 535

कां० ३, अ० ६, ब्रा० ३-४, कं० ३३-३४ व १-५ शतपथब्राह्मण / ५१७
इन्हीं के द्वारा यज्ञ की स्थापना होती है। यदि अतिरात्र या षोडशी हो तो न आहुति दे और न
बीच की परिधि को छुए । चुपके से वहाँ जावे। इस प्रकार वह यज्ञ के ऋतुओं में भेद कर सकता
है ॥३३॥
एकधन विषम संख्या में (अयुङ्क) होते हैं, तीन या पाँच, पाँच या सात, सात या नौ, नौ
या ग्यारह, ग्यारह या तेरह, तेरह या पन्द्रह । जोड़े से सन्तति होती है। यह जो एक बच रहता
है वह यजमान की श्री के लिए होता है। और जो यह यजमान की श्री के लिए बच रहा है वह
सबका धन अर्थात् सधन होता है और चूंकि सबका धन होता है इसलिए उसका नाम 'एकधन'
है ॥३४॥
अध्याय ६—ब्राह्मण ४
अब वे अधिषवण के पास बैठते हैं। अब वह इस (अनामिका अँगुली) में सुवर्ण का
टुकड़ा बाँधता है। दो ही होते हैं, तीसरा नहीं, अर्थात् सत्य और अनृत। देव सत्य है और मनुष्य
अनृत। सुवर्ण अग्नि के बीज से उत्पन्न है। 'सत्य से अंशों को छुऊँ, सत्य से सोम को लूँ'—वह
ऐसा विचारता है इसलिए अनामिका अँगुली में सुवर्ण को बाँधता है ।।१।।
अब वह ग्रावा (पत्थर) को लेता है। ये जो ग्रावा हैं वे अश्ममय अर्थात् पत्थर के
हैं। सोम देव है। सोम द्यौलोक में था । सोम वृत्र था। ये जो पहाड़ हैं वे इसके शरीर हैं।
उसके ही शरीर से उसको पुष्ट करता है, पूर्ण करता है। इसीलिए ग्रावा (पट्टे) पत्थर के होते
हैं। ये जो सोम को निचोड़ते हैं तो मानो उसका हनन करते हैं। उसको उसी से मारते हैं ।
वहीं से वह उठता है और जीवित हैं, इसलिए भी पट्टे पत्थर के होते हैं ॥२॥
वह पट्टे को इस मन्त्र से लेता है— "देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो
हस्ताभ्याम् । आददे रावासि ।"—"तुझको सविता देव की प्रेरणा से, अश्विन के बाहुओं से, पूषा
के हाथों से लेता हूँ । तू दानी है ।" सविता देवों का प्रेरक है। इस प्रकार सविता से प्रेरित करके
उसे लेता है। 'अश्विनों के बाहुओं से' इसलिए कि अश्विन देवों के अध्वर्यु हैं । वह अपने
बाहुओं से नहीं किन्तु उनके बाहुओं से लेता है। 'पूषा के हाथों से' इसलिए कि पूषा भागों का
बाँटनेवाला है। इसलिए पूषा के हाथों से लेता है, अपने हाथों से नहीं। इसके अतिरिक्त वह
(पत्थर का पट्टा) वज्र है, कोई उसे उठा नहीं सकता । उन्हीं देवताओं की सहायता से वह उसे
उठाता है ।।३।।
वह कहता है 'मैं तुझे लेता हूँ, तू दाता है।' जब वे उसको इस पत्थर से कुचलते हैं,
तब आहुति होती है। जब आहुति देता है तो दक्षिणा देता है। इस प्रकार वह पट्टा दो चीजें देता
है, आहुति भी और दक्षिणा भी । इसलिए कहा 'तू दाता है' ॥४॥
"गभीरमिममध्वरं कृधि" (यजु० ६।३०)— 'अध्वर' नाम है यज्ञ का अर्थात् "इस
गम्भीर यज्ञ को कर ।" "इन्द्राय सुषूतमम्" (यजु० ६।३०)— अर्थात् "इन्द्र के लिए उत्तम