शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)
Page 533 of 699
Read in contextका० ३, अ० ६, ब्रा० ३, कं० २६-३३ शतपथब्राह्मण / ५१५
है और घी वज्र है तथा सोम वीर्य है; ऐसा न हो कि वज्र-रूपी घृत से सोमरूपी वीर्य नष्ट हो
जाय इसलिए उसको उस पर तैराता है ॥२६॥
अब वह इस मन्त्र से ग्रहण करता है—"समुद्रस्य त्वा क्षित्याऽउन्नयामि।"-—"तुझको
समुद्र के अक्षय होने के लिए उठाता हूँ।" जल समुद्र हैं। जलों में ही वह अक्षयपन को रखता
है। इसीलिए जल इतना खाया खाये जाने पर भी क्षीण नहीं होते। इसके पीछे वे एकधन ग्रहों
को लेते हैं, इसके पीछे पैर धोने के जल को ॥२७॥
मैत्रावरुण चमसे से वह क्यों लेता है ? इसलिए कि जब यज्ञ देवों से भाग गया तब
उसको देवों ने 'प्रैष' (यज्ञ-सम्बन्धी निमन्त्रणों) द्वारा बुलाया। 'पुरोरुक्' मन्त्रों से उसको
प्रसन्न किया। निविद मन्त्रों से निवेदन किया। इसलिए मैत्रावरुण चमस् से ग्रहण करता
है ॥२८॥
अब वे लौट आते हैं। अग्नीध वसतीवरी जलों और मैत्रावरुण चमस् के साथ चात्वाल
में खड़ा होता है। चात्वाल के ऊपर वह वसतीवरी जलों और मैत्रावरुण चमसे को स्पर्श कराता
है। "समापोऽअद्भिभरग्मत समोषधीभिरोषधीः" (यजु० ६।२८)—"जल जल से मिले और
ओषधि ओषधि से।" इस प्रकार वह उन जलों को, जो कल लाये गये थे और उनको जो आज
लाये गये हैं, मिला देता है ॥२९॥
कुछ लोग ऐसा करते हैं कि मैत्रावरुण चमसे में कुछ वसतीवरी जल को और कुछ मैत्रा-
वरुण चमसे के जल को वसतीवरी में डालते हैं। इस प्रकार यज्ञ का जो रस कल लाया गया और
जो आज लाया गया उन दोनों को मिला देते हैं। परन्तु ऐसा न करना चाहिए। क्योंकि जब
आधवनीय में जल छोड़ता है तब भी तो दोनों रस मिल जाते हैं। अब होता के चमसे में वसती-
वरी को निग्राभ्य के लिए छोड़ता है। चात्वाल के ऊपर क्यों स्पर्श कराता है ? इसलिए कि वहीं
से तो देव द्यौलोक को गये थे। इस प्रकार वह यजमान को स्वर्ग का मार्ग दिखा देता है ॥३०॥
अब वे (हविर्धान में) लौट आते हैं। होता उससे पूछता है, 'हे अध्वर्यु, तुमको जल
मिल गया ?' वह उत्तर देता है कि 'हाँ' या 'जलों ने अपने को मेरे हवाले कर दिया' अर्थात् जल
मिल गया ॥३१॥
और यदि अग्निष्टोम होवे, और प्रचारणी में कुछ (घी का) शेष होम के लिए पर्याप्त
रह जाय तो उससे आहुति दे दे। और यदि होम के लिए पर्याप्त न हो तो चारों चमसों में आज्य
को लेकर आहुति दे, इस मन्त्र से—"यमग्ने पृत्सु मर्त्यमवा वाजेषु यं जुनाः। स यन्ता शश्वतीरिषः
स्वाहा" (यजु० ६।२६)—"हे अग्नि, जिस मनुष्य को तुम युद्ध में या दौड़ में सहायता देते हो
वह निश्चयात्मक जीत को प्राप्त हो जाता है।" वह अग्नि-सम्बन्धी मन्त्र से आहुति देता है
क्योंकि अग्निष्टोम का अर्थ है अग्नि। इस प्रकार अग्नि में अग्निष्टोम की स्थापना करता है।
यदि अग्निष्टोम हो तो इस प्रकार आहुति दे ॥३२॥
और यदि उक्थ्य हो तो बीच की समिधा को छुए। तीन परिधियाँ हैं और तीन उक्थ्य।