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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 525 of 699

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Page 525

का० ३, अ० ६, ब्रा० २, कं० १०-१७ शतपथब्राह्मण / ५०७
"हविष्मतीरिमा आपः" (यजु० ६।२३) - "ये जल हवि-युक्त हैं।" यज्ञ का रस इनमें
मिला है। इसलिए कहा 'हविष्मती'। "हविष्माँ२ऽआविवासति" (यजु० ६।२३) - "हवि-
युक्त पुरुष इनको काम में लावे।" हवियुक्त यजमान इनको काम में लाता है। इसलिए कहा
'हविष्मान् आविवासति' ॥१०॥
"हविष्मान्देवोऽअध्वरः" (यजु० ६।२३) - "देव अध्वर हवियुक्त है।" अध्वर कहते हैं
यज्ञ को। इस प्रकार जिस यज्ञ के लिए वह इन जलों को लेता है उसको वह हवियुक्त कर देता
है। इसलिये कहा कि 'हविष्मान्देवोऽअध्वरः' ॥११॥
"हविष्माँ२ऽअस्तु सूर्यः" (यजु० ६।२३) - "सूर्य हवि-युक्त हो।" यह जो सूर्य तपता है
उसी के लिए इनको ग्रहण करता है। यह विश्वे-देवों के लिए ग्रहण करता है। विश्वे-देव दस
किरणें हैं। इसलिये कहा कि 'सूर्य हवि-युक्त हो' ॥१२॥
इनको लाकर वह गार्हपत्य के पीछे देता है- "अग्नेर्वोऽपन्नगृहस्य सदसि सादयामि"
(यजु० ६।२४) अर्थात् "सुरक्षित गृहवाले अग्नि के घर में तुमको रखता हूँ।" जब अग्निसोम-
वाला पशु निकट आवे तो वह (वसतीवरी जलों को) उसके पास ले जाता है और कहता है
'उत्क्राम' (चले जाओ)।' यजमान हविर्धान के सामने बैठता है और (अध्वर्यु जलों को) वहीं
लेकर खड़ा होता है ॥१३॥
वह दक्षिण द्वार से निकलता है और दक्षिणी श्रोणि में रख देता है। "इन्द्राग्न्योर्भागधेयी
स्थ" (यजु० ६।२४) - "तुम इन्द्र-अग्नि के भाग हो।" क्योंकि यह विश्वे-देवों के लिए ग्रहण
करता है। इन्द्र-अग्नि विश्वे-देव हैं। वह इन जलों को लेकर पत्नी के आगे रख देता है और
पत्नी के पीछे से घूमकर उनको उठा लेता है ॥१४॥
वह उत्तर द्वार से निकलता है। उन जलों को उत्तरी श्रोणि में रख देता है। "मित्रा
वरुणयोर्भागधेयी स्थ" (यजु० ६।२४) - "तुम मित्र-वरुण के भाग हो।" उसी प्रकार न रखे।
यह व्यर्थ है। इससे काम भी सिद्धनहीं होता। ऐसा कहे कि तू इन्द्र-अग्नि के भागधेय हो। इसमें
कोई अनर्थकता नहीं है और काम भी सिद्ध हो जाता है ॥१५॥
इन जलों को रक्षा के लिए लाते हैं। अग्नि आगे है। और जल चारों ओर घूमकर दुष्ट
राक्षसों को हटाते हैं। इनको वह आग्नीध्र (के स्थान) में रख देता है। "विश्वेषां देवानां
भागधेयी स्थ" (यजु० ६।२४) - "तुम विश्वे-देवों के भाग हो।" इस प्रकार वह विश्वे-देवों
को इनमें प्रवेश कराता है। यह 'वसतां' अर्थात् रहनेवालों के लिए 'वरं' शुभ होते हैं। इसलिए
इनका नाम 'वसतीवरी' है। जो इस रहस्य को समझता है वह निवासियों के लिए श्रेष्ठ हो जाता
है ॥१६॥
ये सात यजुः हैं। चार यजुओँ से ग्रहण करता है। एक से गार्हपत्य के पीछे ले जाता है।
एक से चारों ओर फिराता है। एक से आग्नीध्र के स्थान में रखता है। ये सात हुए। जब वाणी
से सात छन्द उत्पन्न हुए तो उनमें से अन्तिम शक्वरी था। इससे सम्पूर्ति हुई। इसलिए सात यजुः
होते हैं ॥१७॥