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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 517 of 699

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Page 517

कां० ३, अ० ८-६, ब्रा० ५-१, कं० ७-११ व १-३ शतपथब्राह्मण / ४६६
उत्पन्न होती है। ऊपर से गृहपति अग्नि के लिए, क्योंकि ऊपर से ही नर स्त्री में वीर्य धारण
कराता है ॥७॥
इस पर वे हृदय-शूल के साथ 'अवभृथ' स्नान को जाते हैं। जब पशु को मारते हैं तो
उसका शोक हृदय में ही इकट्ठा होता है, हृदय से हृदयशूल में। पकाये हुए मांस का जो भाग
छिदा होता है वह स्वादिष्ट होता है।१ इसलिए उसे छेदकर काँटे पर पकाना चाहिए। पशु के
तीन बार हिलाये हुए भाग पर काँटे से निकालकर हृदय को रखता है ॥८॥
अब (शमिता अध्वर्यु को) हृदय-शूल देता है। उसे पृथिवी पर न फेंके, न जल में ।
यदि पृथिवी पर फेंकेगा तो शोक ओषधि और वनस्पतियों में घुस जायगा। यदि जल में फेंकेगा
तो शोक जल में घुस जायगा। इसलिए न पृथिवी पर फेंके, न जल में ॥६॥
किन्तु जल में जाकर ऐसे स्थान पर गाड़ दे जहाँ नमी और खुश्की का मेल हो। परन्तु
जल में जाने की इच्छा न हो तो यूप के सामने जल का पात्र लाकर जहाँ नमी और खुश्की का
मेल हो वहाँ गाड़ दे, इस मन्त्र से— "मापो॒ मौषधीर्हिँ॒सीः" (यजु० ६।२२)—"जल और
ओषधि न सतावें।" इस पर जल और ओषधि हानि नहीं पहुँचाते। "धाम्नो॑ धाम्नो॒ राज॑स्ततो
वरु॑ण नो मुञ्च। यदा॒हुरघ्न्या॒ इति॒ वरु॒णेति॒ शपामहे॒ ततो॑ वरुण नो मुञ्च" (यजु० ६।२२)—
"हे राजा वरुण, हर (थान) जल से हमको छुड़ा। हे वरुण, हमको छुड़ा जिससे वे कहें कि न
हने जानेवाली और वरुण की हम शपथ खाते हैं।" इस प्रकार वह वरुण के सब जालों से या
सम्बन्धी पापों से उसको छुड़ा देता हैं ॥१०॥
अब वह जलों को कहता है—"सुमित्रिया॑ न॒ऽआप॒ऽओष॑धयः सन्तु दुर्मित्रिया॑स्तस्मै॑ सन्तु
यो॒ऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्मः" (यजु० ६।२२)—"जल और ओषधियाँ हमको लाभ पहुंचावें
और हानि उनको जो हमको द्वेष करते हैं या जिनसे हम द्वेष करते हैं।" क्योंकि जब वे शूल के
साथ जाते हैं तो जल और ओषधियाँ मानो उनसे पीछे हटते हैं। परन्तु इस प्रकार वह उनसे
मित्रता करता है। इस प्रकार वे फिर उसके पास आते हैं। अब वह वहां प्रायश्चित्त करता है।
वह यह (अवभृथ) अग्नि-सोम के पशु-याग में नहीं करता, न अग्नि के; किन्तु अनुबन्ध्या-गौ
के सम्बन्ध में करता है। इस प्रकार सब यज्ञ पूर्ण हो जाता है। यह जो वशा-गौ के साथ अवभृथ
किया जाता है उससे अग्नि-सोम या अग्नि के भी पशु-याग की पूर्ति हो जाती है ॥११॥
अध्याय ६—ब्राह्मण १
प्रजापति प्रजा को उत्पन्न करके थक-सा गया। प्रजा उसके पास से हट गई। उसकी
श्री और भोजन के लिए वह उसके पास न ठहरी ॥१॥
उसने सोचा—'मैं थक गया और जिस कामना के लिए मैंने सृष्टि की रचना की वह
भी पूरी न हुई। मेरी प्रजा मेरे पास से चली गई। मेरी श्री और भोजन के लिए मेरे पास ठहरी
नहीं' ॥२॥
प्रजापति ने सोचा कि—'मैं फिर अपने को कैसे पुष्ट करूँ ? कैसे मेरी प्रजा लौटे और
१. पशु-हिंसा सर्वथा अवैदिक है और ऐसे स्थल पूर्णतः प्रक्षिप्त हैं।
—स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती