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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 515 of 699

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Page 515

कां० ३, अ० ८, ब्रा० ४-५, कं० १०-१८ व १-७ शतपथब्राह्मण / ४६७
भी सन्तान पीछे से ही उत्पन्न होती है ॥१०॥
वह उपयाज को इस मन्त्र से देता है—"समुद्रं गच्छ स्वाहा।" (यजु० ६।२२) जल
समुद्र है। जल वीर्य है। यह वीर्य ही है जिसको सींचते हैं ॥११॥
"अन्तरिक्षं गच्छ स्वाहा।" (यजु० ६।२१) अन्तरिक्ष में ही सन्तान उत्पन्न होती हैं।
अन्तरिक्ष में ही वह उत्पत्ति करता है ॥१२॥
"देवं सवितारं गच्छ स्वाहा।" (यजु० ६।२१) देवों का प्रेरक सविता है। सविता से
प्रेरित होकर जीवों को प्रेरित कर रहा है ॥१३॥
"मित्रावरुणौ गच्छ स्वाहा।" (यजु० ६।२१) प्राण और उदान मित्र और वरुण हैं।
इस प्रकार प्रजाओं में प्राण और उदान धारण कराता है ॥१४॥
"अहोरात्रे गच्छ स्वाहा" (यजु० ६।२१) दिन-रात में ही सन्तान उत्पन्न होती है।
दिन-रात में ही वह जीवों को उत्पन्न कराता है ॥१५॥
"छन्दाँ७सि गच्छ स्वाहा।" (यजु० ६।२१)। सात छन्द हैं—सात घर के (ग्राम्य)
और सात वन के (आरण्य) पशु हैं। इन दोनों को वह उत्पन्न कराता है ॥१६॥
"द्यावापृथिवी गच्छ स्वाहा।" (यजु० ६।२१) प्रजापति ने प्रजा को रचकर द्यौ और
पृथिवी के बीच में भर दिया, इसलिए वह द्यौ और पृथिवी के बीच में है। इसी प्रकार यह आहुति
देनेवाला भी प्राणियों को उत्पन्न करके उनको द्यौ और पृथिवी के बीच में रख देता है ॥१७॥
अब वह अन्य उपयाज करता है। यदि इन अन्य उपयाजों को न करे तो उतने ही पशु
रहें जितने आरम्भ में उत्पन्न हुए थे। और न उत्पन्न हों। परन्तु अधिक उपयाजों को करके वह
सन्तान को बढ़ाता है, जिससे इस पृथिवी पर फिर-फिर उत्पन्न हो ॥१८॥
अध्याय ८—ब्राह्मण ५
वह उपयाज करता है—"यज्ञं गच्छ स्वाहा।" (यजु० ६।२१) जल यज्ञ है, जल वीर्य
है। इसके द्वारा वीर्य को सींचता है ॥१॥
"सोमं गच्छ स्वाहा।" (यजु० ६।२१) वीर्य सोम है। वीर्य को इससे सींचता है ॥२॥
"दिव्यं नभो गच्छ स्वाहा।" (यजु० ६।२१) जल 'दिव्य नभ' है। जल वीर्य है। वीर्य
को इससे सींचता है ॥३॥
"अग्निं वैश्वानरं गच्छ स्वाहा।" (यजु० ६।२१) यह पृथिवी अग्नि वैश्वानर है। यही
प्रतिष्ठा है। इस प्रकार इस प्रतिष्ठा को उत्पन्न करता है ॥४॥
अब इस मन्त्र से मुख का स्पर्श करता है—"मनो मे हार्दि यच्छ" (यजु० ६।२१)—
"मुझे मन और हृदय दे।" इस प्रकार उपयाज करनेवाला अपने को नहीं आहुति देता ॥५॥
अब (पशु की) पूंछ से 'पत्नी-संयाज' करते हैं। पूंछ पिछला भाग है। स्त्रियों के पिछले
भाग से ही सन्तान की उत्पत्ति होती है। इसलिए पूंछ से 'पत्नी-संयाज' करके सन्तान की उत्पत्ति
करता है ॥६॥
देवों की पत्नियों के लिए भीतर से भाग काटता है; स्त्रियों के अन्दर से ही सन्तान