Skip to content
SarvaKosh
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 51 of 699

Read in context
Page 51

कां० १, अ० २, ब्रा० ४, कं० १-४ शतपथब्राह्मण / ३३
मेध चला गया और घोड़े में जा घुसा । उन्होंने घोड़े का आलभन किया। तब मेध घोड़े से निकल-
कर गाय में घुस गया । तब उन्होंने गाय का आलभन किया । तब मेध गाय से निकलकर भेड़ में
घुस गया । तब उन्होंने भेड़ का आलभन किया । तब मेध भेड़ में से निकलकर बकरी में चला
गया । तब उन्होंने बकरी का आलभन किया । तब मेध बकरी में से निकल भागा ॥६॥
वह पृथिवी में चला गया। वे पृथिवी को खोदकर खोजने लगे, और उसको पा लिया ।
यही चावल और जौ हैं। इनको आजकल भी पृथिवी को जोतकर निकालते हैं। उन सब पशुओं के
आलभन से जो लाभ होता है वही चावल की हवि से होता है, उस मनुष्य को जो इस रहस्य को
समझकर यज्ञ करता है। यह पांक्त यज्ञ है अर्थात् पाँच पशुओं का ॥७॥
यह जो पीठी है वह लोम है। जो जल है वह त्वचा है। जब गूँधते हैं तो यह मांस है।
मांस गूँधा हुआ होता है। पकने से कड़ी हड्डी के समान हो जाता है। हड्डी तो कड़ी होती है। जब
उस पर घी डालते हैं तो मज्जा हो जाता है। इस प्रकार यह हवि पांक्त पशु हो जाती है ॥८॥
जो पुरुष का आलभन किया था वह किं-पुरुष हो गया। जो घोड़े का आलभन किया
और गाय का, वह गौर और गवय बन गये। भेड़ का आलभन किया तो ऊँट बन गया। बकरी
का आलभन किया तो वह शरभ बन गया। इसलिए हमें पाँच पशुओं को न खाना चाहिए, क्योंकि
इनमें मेध नहीं रहा ॥६॥
अध्याय २-ब्राह्मण ४
जब इन्द्र ने वृत्र के वज्र मारा तो उसके चार टुकड़े हो गये। इसके तीन भागों में तिहाई
या उसके लगभग स्फ्या हो गई। तिहाई या लगभग यूप हो गया और तिहाई या लगभग रथ हो
गया। जो भाग वृत्र के लगा वह टूटकर शर (बाण) हो गया। बाण को शर इसलिए कहते हैं कि
वह टूट गया ('शृ' का अर्थ है टूटना') । वज्र के इस प्रकार चार टुकड़े हो गये ॥१॥
इनमें से दो टुकड़े ब्राह्मण यज्ञ के काम में लाता है अर्थात् स्फ्या और यूप, और शेष दो
टुकड़े क्षत्रिय लड़ाई के काम में लाता है अर्थात् रथ और शर ॥२॥
वह स्फ्या को लेता है। जैसे इन्द्र ने वृत्र को मारने के लिए वज्र लिया था, उसी प्रकार
अध्वर्यु अपने वैरी को मारने के लिए स्फ्या¹ लेता है। स्फ्या को लेने का यही प्रयोजन है ॥३॥
वह स्फ्या को यजु० १।२४ के मन्त्रांश को पढ़कर पकड़ता है- "देव सविता की प्रेरणा से,
अश्विनों की भुजाओं से, देव पूषा के दोनों हाथों से देवताओं के अध्वर के लिए तुझे उठाता हूँ।"
सविता देवों का प्रेरक है, अतः वह देव सविता की प्रेरणा से ही स्फ्या लेता है। अग्नि दो अध्वर्यु
१. स्फ्या तलवार की आकृति की (खदिर की) लकड़ी की होती है जो यज्ञ में काम आती है।