Skip to content
SarvaKosh
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 509 of 699

Read in context
Page 509

कां ३, अ० ८, ब्रा० ३, कं० २०-२६ शतपथब्राह्मण / ४६१
अब वसाहोम को लेता है, इस मन्त्र से- "रेडसि" (यजु० ६।१८)-"तू काँपता है।" वह
वसा काँपती-सी है इसलिए कहा 'रेडसि'। "अग्निष्ट्वा श्रीणातु" (यजु० ६।१८) - "अग्नि
तुझको पकावे।" अग्नि ही उसको पकाता है इसलिए कहा कि 'अग्नि तुझे पकावे।' "आपस्त्वा
समरिणन्" (यजु० ६।१८) - "जल तुझको मिलावे।" जल ही इन अंगों से रस को इकट्ठा करके
मिलाते हैं। इसलिए कहा कि 'जल तुझे मिलावे' ॥२०॥
“वातस्य त्वा ध्राज्यै" (यजु० ६।१८) - "हवा तुझे हिलावे।" यह जो वायु है वह
अन्तरिक्ष में बहता है। वायु के लिए ही इसको लेता है, इसलिए कहता है 'तू हवा के लिए
है" ॥२१॥
"पूष्णो रँ॒ह्या" (यजु० ६।१८) - "पूषा के वेग के लिए।" वह वायु पूषा का वेग है।
उसी के लिए यह ग्रहण करता है; इसलिए कहता है कि 'पूषा के वेग के लिए' ॥२२॥
“ऊष्मणो व्यथिषत्” (यजु० ६।१८)-"ऊष्ण से तपाया जाता है।" यह वायु उष्ण है।
उसी के लिए ग्रहण करता है। इसलिए कहता है कि 'उष्ण से तपाया गया।' इस पर दो बार घी
लगाता है ॥२३॥ [शतम् २१००]
पार्श्व या वासि (छुरियों के नाम हैं) से मिलाता है, इस मन्त्र से- "प्रयुतं द्वेषः" (यजु०
६।१८)-"द्वेष हट गया।" इससे वह यहाँ दुष्ट राक्षसों को हटाता है ॥२४॥
अब जो हवि (यूप) बचता है उसे समवत्तधानी में लाता है। उसमें हृदय, जीभ, छाती,
तनिम, मतस्न (गुर्दे), वनिष्ठ को डाल देता है। फिर उस पर दो बार घी लगाता है ॥२५॥
दोनों ओर सोने के टुकड़ों को इसलिए रखता है कि जब पशु की आग में आहुति देते हैं
तो उसको मारते हैं। सोना अमृत-जीवन है। इस प्रकार उसको अमृत-जीवन में स्थापित करता
है। इसी से वह उत्पन्न होता है, इसी से जीता है। इसलिए दोनों ओर सोने का टुकड़ा होता
है ॥२६॥
और चूंकि तिरछा काटता है। दाहिनी टांग और बायां चूतड़, तथा बायीं टांग और
दाहिना चूतड़, इसलिए यह पशु तिरछे पैर बढ़ता है। यदि सीधा काटता तो दोनों पैर साथ-साथ
उठते हैं, इसलिए तिरछा काटता है। अब प्रश्न है कि सिर को क्यों नहीं काटता, न कन्धों को,
न गर्दन को, न पिछली जांघों को ? ॥२७॥
असुरों ने पहले पशु का आलभन किया था। देव डर के मारे उसके पास नहीं गये।
पृथिवी ने उनसे कहा- 'इसकी परवाह न करो। मैं जिस-जिस प्रकार ये इसको करेंगे, मैं इसकी
साथी होऊँगी' ॥२८॥
उसने कहा- 'एक आहुति इन्होंने दी। एक छोड़ दी। जिसको उन्होंने छोड़ दिया यह
यही भाग हैं।' इस पर देवों ने तीन अंगों के अग्निस्विष्टकृत् के लिए अर्पण किया, इसलिए त्र्यङ्ग-
आहुति हुई। तब असुरों ने सिर, कन्धों, गर्दन और पिछली जांघों के टुकड़े किये। इसलिए इनको
नहीं काटना चाहिए। चूंकि त्वष्टा ने गर्दन पर थूका था, इसलिए गर्दन के टुकड़े न करे। अब
वह होता कहता है कि बकरे के हवि पर अग्नि-सोम के लिए अनुवाक कह। और श्रौषट् कहकर