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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 507 of 699

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Page 507

कां० ३, अ० ८, ब्रा० ३,० क ११-१६ शतपथब्राह्मण / ४८६
जब देवों ने पहले पशु का आलभन किया तो त्वष्टा ने उसके सिर पर थूक दिया यह
सोचकर कि 'वे उसको छुएँगे नहीं।' क्योंकि पशु तो त्वष्टा के ही हैं। यह सिर में मस्तिष्क और
गर्दन में मज्जा बन गया। इसलिए वह थूक है, क्योंकि त्वष्टा ने उस पर वमन कर दिया।
इसलिए उसको न खाना चाहिए क्योंकि यह त्वष्टा का वमन किया हुआ है ॥११॥
इसका मेध नीचे गिर पड़ा; उससे एक वृक्ष उगा। उसको देवों ने देखा। इसलिए प्रख्य
हुआ। प्रख्य ही प्लक्ष है। उसी मेध से वह उसको चंगा करता है और पूर्ण करता है। इसलिए
प्लक्ष शाखाएँ ऊपर के बर्हि का काम देती हैं ॥१२॥
अब जुहू और उपभृति दोनों में घी एक तह लगाता है, वसा-होम-हवनी और समवत्त-
धानी में भी। जुहू और उपभृति दोनों में सोने के टुकड़े भी रखता है ॥१३॥
अब वह (होता से) कहता है कि मनोता के लिए हवि पर अनुवाक कह। हवि पर
मनोता के लिए अनुवाक कहलवाने का तात्पर्य यह है—जब पशु का आलभन करते हैं तो सब
देवता घिर आते हैं कि मेरा नाम लेगा, मेरा नाम लेगा। क्योंकि पशु तो सभी देवताओं की हवि
हैं।१ सभी देवताओं के मन उस पशु में लगे रहते हैं। उनके उन मनों को वह प्रसन्न करता है
जिसमें से देवों के मन वहाँ व्यर्थ न आवें। इसलिए वह मनोता के लिए हवि पर अनुवाक
कहलवाता है ॥१४॥
पहले वह हृदय के टुकड़े करता है। हृदय तो बीच में है। फिर वह पहले इसके टुकड़े
क्यों करता है ? इसलिए कि हृदय प्राण है, यहीं से प्राण ऊपर को जाता है। पशु भी प्राण है
क्योंकि जब तक सांस लेता है तभी तक पशु है, और जब प्राण निकल जाता है तो लकड़ी के
समान निरर्थक पड़ा रहता है ॥१५॥
हृदय ही पशु है। इसलिए वह पहले इसके आत्मा (धड़) को ही काटता है। इसलिए
यदि कोई टुकड़ा रह भी जाय तो परवाह न करनी चाहिए। क्योंकि पहले हृदय को काटने से पशु
का सम्पूर्ण ही कट जाता है। इसलिए हृदय के बीच में रहते हुए भी पहले उसी को काटते हैं,
फिर यथापूर्व ॥१६॥
फिर जिह्वा को, क्योंकि वह अगले भाग में सबसे आगे है। फिर छाती क्योंकि वह भी
वैसी ही है। फिर साथ चलनेवाला अर्थात् बायाँ अगला पैर। फिर बगल, फिर यकृत, फिर
वृक्क ॥१७॥
गुदा के तीन टुकड़े करता है। स्थूल भाग पिछली आहुतियों के लिए (रख छोड़ता है)।
बीच के भाग को जुहू में काटकर दो भाग करता है। और सबसे सूक्ष्म भाग को त्र्यंग्य के लिए।
फिर एक घर श्रोणि को। इतने को जुहू में काटकर रखता है ॥१८॥
अब त्र्यंग्य के अगले भाग को उपभृति में रखता है, गुदा के दो टुकड़े काटकर, और
त्र्यंग्य की श्रोणि के। उन पर दो सोने के टुकड़े रखता है। उन पर घी छोड़ता है ॥१९॥
१. देवत्व और पशुत्व का मेल असम्भव है। वस्तुतः हृदय की दुर्भावना, जिह्वा की कटुता एवं
अंग-प्रत्यंग की अपवित्रता को भस्म करना ही देवत्व है। प्रस्तुत बीभत्स व्याख्या सर्वथा
प्रक्षिप्त है। —स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती