शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)
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Read in contextकां० ३, अ० ८, ब्रा० २, कं० १६-२४ शतपथब्राह्मण / ४८३
अब वह वपा को निकालकर दोनों वपाश्रपणियों को ढक देता है इस मन्त्र से—"घृतेन
द्यावापृथिवी प्रोर्णुवाथां" (यजु० ११।१६)—"द्यौ और पृथिवी को घी से ढको।" अर्थात् इस
द्यौ और पृथिवी को शक्ति और रस से युक्त करता है। इनमें शक्ति और रस की स्थापना करता
है। यह प्रजा इस ऊर्ज और रस के सहारे ही जीवित है॥१६॥
ये दोनों वपा-पात्र कार्ष्मर्य लकड़ी के होते हैं। जब देव लोगों ने पहले पशु को पकड़ा
(मारा) तो उसको ऊपर को खींचा, तब उसका मेध नीचे को गिर पड़ा। उससे वनस्पति उत्पन्न
हुआ। और चूंकि यह खिंचा और मेध नीचे को गिरा, इससे कार्ष्मर्य वृक्ष हुआ। इसी मेध से वह
इसको पूरा करता है। इसीलिए वपा-पात्र कार्ष्मर्य लकड़ी के होते हैं॥१७॥
उस वपा को चारों ओर से काटता है और उसको पशुश्रपण में पकाता है। इस प्रकार
यह पक जाता है। अब आग्नीध्र एक जलती लकड़ी लेता है। वे चात्वाल के पीछे जाते और
आहवनीय की ओर चलते हैं। अध्वर्यु आहवनीय में उस तृण को डाल देता है—"वायो वे
स्तोकानम्" (यजु० ६।१६)—"हे वायो, इन बूंदों को लो," क्योंकि यह उन बूंदों को जलाने-
वाला है॥१८॥
अब उत्तर को खड़ा होकर वपा को तपाता है। उसे अग्नि के पास होकर गुजरना है और
दक्षिण की ओर चलकर पकाना है। इससे वह उसको प्रसन्न करता है और इस प्रकार प्रसन्न
होकर अग्नि उसको हानि नहीं पहुँचाता। इसलिए उत्तर की ओर वपा को पकाता है॥१९॥
उसको यूप और अग्नि के बीच में ले जाते हैं। इसको वेदी के बीच में होकर क्यों नहीं
ले जाते जहाँ अन्य हवियों को ले जाते हैं ? इसलिए कि कहीं बे-पकी वपा के साथ इसका संसर्ग न
हो जाय। यूप के आगे बाहर की ओर क्यों नहीं ले जाते ? यदि ऐसा करें तो यज्ञ से बहिष्कृत हो
जाय। इसलिए यूप और अग्नि के बीच से ले जाते हैं। दक्षिण की ओर जाकर प्रतिप्रस्थाता उसको
पकाता है॥२०॥
अध्वर्यु स्रुवा में घी लेकर छोड़ता है—"अग्निराज्यस्य वेतु स्वाहा" (यजु० ६।१६)—
"अग्नि घी को स्वीकार करे।" इस प्रकार स्वाहा-युक्त पकी हुई आहुतियाँ अग्नि को पहुँचती
हैं॥२१॥
अब वह (मैत्रावरुण से) कहता है—स्तोकों (बूंदों) के लिए अनुवाक कहो। अब वह
आग्नेय मन्त्रों को स्तोकों के लिए पढ़ता है। स्तोकों के लिए आग्नेय मन्त्रों के अनुवाक क्यों पढ़ता
है ? इसलिए कि इसी (पृथिवी) के दान से वृष्टि होती है। अग्नि यहीं से वृष्टि को लेती है। यही
बूंदें बरसती हैं जो यहाँ ली जाती हैं। इसलिए अग्नि के मन्त्रों से, अनुवाक से बूंदों की प्रशंसा में
बोले जाते हैं। जब पक जाय तब—॥२२॥
प्रतिप्रस्थाता कहता है 'पक गया, आगे चलो।' अध्वर्यु दो स्रुचों को लेकर, आगे चलकर
'श्रौषट्' कहता है; 'स्वाहा-कृति को करो।' ऐसा कहकर वषट्कार करके घी की आहुति देता
है॥२३॥
आहुति देकर पहले वपा को और फिर पृषद् घी को अभिघार करता है। चरकाध्वर्यु