Skip to content
SarvaKosh
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 495 of 699

Read in context
Page 495

कां० ३, अ० ८, ब्रा० १, कं० ८-१५ शतपथब्राह्मण / ४७७
परन्तु ऐसा न करना चाहिए। अग्नि जिसके चारों ओर फिरा ली गई वह तो अग्नि से
ग्रसित हो गया। इसका अर्थ यह होगा कि जो ग्रसित हो चुका उसको छीनकर दूसरे को दे.दिया
गया। इसलिए इस लकड़ी से ही अंगारों को लेकर उसमें पका लेना चाहिए ॥८॥
अब आग्नीध्र एक और जलती लकड़ी लेकर आगे आता है। इस प्रकार वह अग्नि को
आगे रखता है कि वह दुष्ट राक्षसों को दूर भगा देगी। और भयरहित मार्ग से पशु को ले जाता
है। दोनों वपाश्रपणियों से प्रतिप्रस्थाता उस (आग्नीध्र) को देता है। प्रतिप्रस्थाता को अध्वर्यु
देता है और अध्वर्यु को यजमान ॥९॥
इस पर कुछ लोग कहते हैं कि यजमान न पकड़े। क्योंकि उसको मृत्यु के लिए ले जाते हैं,
इसलिए उसको नहीं थामना चाहिए। परन्तु उसको थामना चाहिए ही, क्योंकि जिसको यज्ञ के
लिए ले जाते हैं उसे मृत्यु के लिए नहीं ले जाते। दूसरे यह कि यदि वह न थामेगा तो अपने को
यज्ञ से हटा लेगा, इसलिए उसे थामना अवश्य चाहिए। यह एक प्रकार का परोक्ष थामना है अर्थात्
वपाश्रपणियों द्वारा प्रतिप्रस्थाता थामता है। प्रतिप्रस्थाता को अध्वर्यु देता है और अध्वर्यु को
यजमान। इस प्रकार यह थामना परोक्ष प्रकार का है ॥१०॥
अब छायी हुई वेदी में से अध्वर्यु दो तृण निकालता है, और श्रौषट् कहकर कहता है—
'होता, देवों के लिए हव्य ला।' पशु-याग १ में यह विश्वेदेवों का भाग है ॥११॥
अब वह यजमान से कहलवाता है—"रेवति यजमाने" (यजु० ६।११)—"हे भाग्यवती,
तू यजमान में।" वाणी रेवती है क्योंकि वह बहुत बोलती है, इसलिए वाणी रेवती हुई। "प्रियं
धाऽआविश" (यजु० ६।११) —"प्रिय को धारण कर। तू आ।" अर्थात् तू बिना आपत्ति के
आ। "उरोरन्तरिक्षात् सजूर्देवेन वातेन" (यजु० ६।११) —"विस्तृत अन्तरिक्ष से दैवी वायु के
द्वारा।" जिस प्रकार मनुष्य बिना किसी जड़ के स्वच्छन्दता से अन्तरिक्ष में विचरता है, इसी प्रकार
राक्षस भी अन्तरिक्ष में बिना किसी मूल के विचरता है। (नोट-पेड़ की मूल होती है, वह स्थावर
है। राक्षस और मनुष्य दोनों जंगम हैं)। यह जो कहा कि 'विस्तृत अन्तरिक्ष से दैवी वायु के
द्वारा' इसका तात्पर्य है कि वायु से मिलकर इसकी अन्तरिक्ष से रक्षा कर ॥१२॥
"हविष्पस्तमना यज" (यजु० ६।११) —"हवि की आत्मा से यज्ञ कर।" अर्थात् वाणी
से कहता है कि हवि की आत्मा से यज्ञ कर। "समस्य तन्वा भव" (यजु० ६।११) —अर्थात् वाणी
से कहता है कि इस हवि की आत्मा के साथ संयुक्त हो ॥१३॥
जहाँ उसको मारते हैं उसके सामने तृण को फेंकते हैं। "वर्षो वर्षीयांसं यज्ञे यज्ञपतिं धाः"
(यजु० ६।११) —"हे महान्, इस महान् यज्ञ में यज्ञपति को ले जा।" इस प्रकार कुशों को नीचे
बिछा देता है कि हवि का कोई भाग भी नष्ट न हो सके। इस प्रकार काटने में जो कुछ नीचे
गिरता है वह इन्हीं कुशों में गिरता है। इस प्रकार नष्ट नहीं होता ॥१४॥
अब आहवनीय की ओर जाकर उधर को मुंह करके बैठते हैं कि इस कटते हुए को देख
न लें। वे इसको 'कूट' अर्थात् सामने की हड्डी से नहीं काटते; यह मानुषी विधि है। न कान के

१. 'पशु-याग' वेद-विरुद्ध एवं प्रक्षिप्त है। मन्त्रांश (यजु० ६-११) स्पष्ट कहता है—'पशून्-
स्त्रायेश्चाम्' अर्थात् 'पशुओं की रक्षा करो'। —स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती